कोटेशन्स
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अपनी ही बात को सच्चा मान उसका दृढतापूर्वक साथ तो आप सदियों से देते आ रहे हैं। लेकिन यह क्यों नहीं समझते कि यथायोग्य आलोचना सहे बगैर वक्त के अनुसार राह नहीं पायी जा सकती। मनुष्य की चेतना का यह नियम है कि जो जितना अपने खिलाफ सुनने को तैयार रहता है, उतना ही वह निखरता चला जाता है। अपनी ही कट्टरता के कारण विश्वभर के मुसलमान भाई ‘‘बुद्धिमानों’’ की इस अपार करुणा से करीब-करीब वंचित हैं।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति से किसी मनुष्य को इतनी सत्ता नहीं कि वह किसी दूसरे मनुष्य के स्थायी सुख का उपाय कर सके। उस हेतु तो हर मनुष्य को स्वयं ही अपने प्रयास करने होते हैं।

-दीप त्रिवेदी

दिल से ‘‘सच्चा-व्यक्ति’’ बिछड़ने के तमाम गमों से हमेशा आजाद रहता है। क्योंकि वह जानता है कि शरीर से मिलना-बिछड़ना कुदरत की बनायी परिस्थितियों पर निर्भर है, सो उसका दुःख क्या पालना? और किसी से मन से भी बिछड़ गए तब तो उसका दुःख पालने का वैसे ही सवाल नहीं उठता।

-दीप त्रिवेदी

वक्त ने ऐसी करवट ली कि संतों और व्यवसायियों की परिभाषा ही परिवर्तित हो गयी। पाखंड के नाम पर लाखों को लूटने वाले व्यवसायी आजकल ‘संत’ बने बैठे हैं। जबकि वास्तविक संत तो वे हैं जो अपनी कर्मठता से व्यवसाय फैलाकर लाखों को रोजगार दिये हुए हैं।

-दीप त्रिवेदी

जीवन संवारना चाहते हो तो रोज सुबह दस मिनट एकान्त में अपने साथ बैठकर आज का दिन सार्थक बनाने हेतु सोचो व रात्रि को सोने से पूर्व पांच मिनट कहीं दिन Waste तो नहीं गया, उस बाबत सोचो। देखिये आप जल्द ही क्या-से-क्या हो जाते हैं।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य की सबसे बड़ी गरिमा उसकी परम-स्वतंत्रता है, कृपया उसे हमेशा सम्भाल कर रखें। न तो किसी के जीवन में दखल दें और न ही किसी व्यक्ति, धर्म, समाज या शास्त्र को अपने जीवन में दखल देने दें। क्योंकि... आप अकेले, इकलौते व नवीन हैं। आप जैसा कोई न पहले हुआ है और न आगे होगा। अतः आपका एकमात्र कर्तव्य सबसे बचते हुए अपनी इस जीवन-यात्रा को यादगार बनाना है।

-दीप त्रिवेदी

यदि जीवन में कुछ बड़ा कर दिखाने के अहंकार का अनुभव करना हो तो सुबह-शाम करने वाले छोटे-मोटे पचासों अहंकारों को छोड़ना पड़ेगा।

-दीप त्रिवेदी

विश्व के किसी भी देश को जितना सुकून कलाकारों ने पहुंचाया है; उतना ही चैन उनका वहां के राजनेताओं व धर्मगुरुओं ने मिलकर लूटा है।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य पूर्ण स्वतंत्र है, इसीलिए उसके साथ जो कुछ भी घटता है उसकी जिम्मेदारी उसके स्वयं की होती है। जो व्यक्ति दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है, वह लगातार गलतियां दोहराता रहता है।

-दीप त्रिवेदी

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