हमारे जीवन व व्यवसाय के सिद्धांतों में कोई फर्क नहीं। दोनों सबके हित की सोचने से ही फलते-फूलते हैं। स्वार्थी प्रवृत्ति से दोनों विनाश के कगार पर आ खड़े होते हैं।
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हमारे जीवन व व्यवसाय के सिद्धांतों में कोई फर्क नहीं। दोनों सबके हित की सोचने से ही फलते-फूलते हैं। स्वार्थी प्रवृत्ति से दोनों विनाश के कगार पर आ खड़े होते हैं।
आप अपनी ‘स्वतंत्रता’ हरहाल में बरकरार रखने की शक्ति जुटाने व अपने मूड की किसी कीमत पर रक्षा करने की ताकत प्राप्त कर लें; फिर दूसरे का जो होना हो...हो, पर आप आनंद व सफलता के उच्चतम शिखर पर अवश्य विराजमान हो जाएंगे।
हर कोई ‘अहंकार’ के ऊंचे शिखरों पर विराजमान होना चाहता है; परंतु कुदरत की लीला ऐसी है कि यहां अहंकार के सर्वोच्च शिखरों पर सिर्फ ‘निःअहंकारी’ ही विराजमान हो पाता है।
क्या ये ‘क्रिश्चियन’ उसी जीसस के अनुयायी हैं जो सबके उद्धार के लिये हंसते-हंसते सूली चढ़ गए? सच बोलने के बावजूद ‘बाइबल’ के नाम पर पादरियों ने गैलेलियो का जो हाल किया था, उसे देखते हुए मुझे तो ऐसा नहीं लगता।
किसी भी बात का दृढ़तापूर्वक इन्कार करना, आज नहीं कल उस ‘वस्तु’ को जीवन में खतरनाक स्वरूप धारण करने हेतु न्यौता देना है।
प्रायः लोग-बाग काले कलर को अशुभ मानते हैं। पर वही लोग अपने सर के बाल सफेद हो जाने पर उन्हें काला करवा लेते हैं। अब इन्हें धोखेबाज नहीं तो और क्या कहें?
पता नहीं यह मुस्लिम समाज वक्त के साथ अपनी कुनीतियां छोड़ने में इतना वक्त क्यों लगाता है? अब जब आज सऊदी अरब में स्त्रियों को मताधिकार का हक दिया जा सकता है, तो यह पचास-सौ साल पहले क्यों नहीं दिया जा सकता था?
जीवन हो या व्यवसाय - दोनों अपनी ऊंचाइयां कब छू पाते हैं? जब आप परंपरा से हटकर कुछ नया करते या बनाते हैं। यानी "Power of Creativity" दोनों के फलने-फूलने हेतु आवश्यक है।
दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।
दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।