जीवन में आपके साथ या आपके आसपास कुछ भी ‘‘अप्रत्याशित’’ घटता है तो वह सिवाय आपकी मूर्खता के और कुछ नहीं दर्शाता है।
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जीवन में आपके साथ या आपके आसपास कुछ भी ‘‘अप्रत्याशित’’ घटता है तो वह सिवाय आपकी मूर्खता के और कुछ नहीं दर्शाता है।
मनुष्य का सारा भूतकाल कचरे के डब्बे जैसा है। उसमें हाथ डालकर जब भी और जो भी निकालोगे, बदबूदार ही होगा। वैसे ही उसकी सारी भविष्य की इच्छाएं पक्षी की तरह आसमान में उड़ने की इच्छा के समान है, जब भी कोशिश करेगा - जमीन पर ही गिरेगा।
मनुष्य का सारा भूतकाल कचरे के डब्बे जैसा है। उसमें हाथ डालकर जब भी और जो भी निकालोगे, बदबूदार ही होगा। वैसे ही उसकी सारी भविष्य की इच्छाएं पक्षी की तरह आसमान में उड़ने की इच्छा के समान है, जब भी कोशिश करेगा - जमीन पर ही गिरेगा।
बुद्धिमान वह नहीं जिसके पास बड़ी डिग्री है या जिसे हजारों विषयों की जानकारी है। बल्कि बुद्धिमान वह है जो अपनी सीमा पहचानता है... यानी जो अपने Pluses और Minuses से अच्छी तरह वाकिफ है।
मनुष्य का पूरा जीवन मन से चलता है, और यह मन नियमानुसार बर्तता है। ...ऐसे में मन के नियम जानने और समझने से ज्यादा महत्वपूर्ण मनुष्यजीवन में और क्या हो सकता है?
आप अस्तित्व का एक हिस्सा हैं, आपके जीवन की परेशानी यह है कि आप स्वार्थवश अपनी एक अलग दुनिया बनाने में लगे हुए हैं।
कुदरत का यह नियम है कि दुःख पड़ने पर वह मनुष्य को सहन करने की शक्ति दे ही देती है। गौर करना, हम जो दुःख वर्तमान में है उससे इतना दुःखी नहीं...जितना आने वाले दुःखों की सोच-सोच चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं।
एक बार में एक कार्य पर ध्यान ‘योग’ है, फिर वह कार्य कोई भी क्यों न हो? वैसे ही एक बार में अनेक कार्यों पर ध्यान ‘काम’ है, फिर चाहे वे कार्य आप कितने ही महान या आवश्यक मानकर क्यों न कर रहे हों।
जिस व्यक्ति को उपवास करने या बाल नोचने जैसे खुद को सताने वाले विचार आते हैं, उससे स्वतः ही ऐसे कार्य हो जाते हैं जिससे दूसरों को कष्ट पहुंचे। अब आप ही बताइए कि दूसरों को कष्ट देने वाला ऐसा मनुष्य जीवन में सुखी कैसे रह सकता है?
क्या यह हास्यास्पद नहीं कि हम अपने जीवन से कष्टों को दूर करने हेतु जिन महापुरुषों की पूजा करते हैं, कभी उनके जीवन में नहीं झांकते कि उन्होंने जीवनभर कितने कष्ट भोगे हैं। दरअसल हम यह सीधा गणित क्यों नहीं समझते कि जबतक जीवन है तब तक कष्ट रहने ही हैं, चाहे वह कितना ही बड़ा महापुरुष क्यों न हो? ...यानी उनकी महानता कष्ट न मिलने के कारण नहीं; बल्कि कष्ट में भी उनकी हंसते रहने की क्षमता के कारण है।