आज के समय में मनुष्य के जीवन को बदल के रख देने वाले ‘‘ज्ञान’’ के सिवाय ‘‘चैरिटी’’ ना तो स्वीकार्य है - ना ही व्यावहारिक। ...यानी सिर्फ ऐसा ज्ञान जो मनुष्य को सफलता की सी़ढियां चढ़ना सिखा दे।
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आज के समय में मनुष्य के जीवन को बदल के रख देने वाले ‘‘ज्ञान’’ के सिवाय ‘‘चैरिटी’’ ना तो स्वीकार्य है - ना ही व्यावहारिक। ...यानी सिर्फ ऐसा ज्ञान जो मनुष्य को सफलता की सी़ढियां चढ़ना सिखा दे।
दुनिया का कोई भगवान इतने छोटे मन का नहीं हो सकता कि उसे चापलूसी या पूजा की आवश्यकता पड़ जाए। और ऐसा करने से वह खुश हो जाए या आपका कुछ फायदा करा दे, यह तो संभव ही नहीं। ...ऐसा तो सिर्फ शैतान ही हो सकता है।
हमें न सूरज-चांद उगाने हैं, न गुरुत्वाकर्षण ही सम्भालना है। हमें तो अपने खाये भोजन का खून तक नहीं बनाना है। हमें तो सिर्फ अपने जीवन को आनंद, शांति व सफलता की राह पर लगाना है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि बुद्धिमानी का दावा करने वाले हमसे इतना तक नहीं होता?
हमें न सूरज-चांद उगाने हैं, न गुरुत्वाकर्षण ही सम्भालना है। हमें तो अपने खाये भोजन का खून तक नहीं बनाना है। हमें तो सिर्फ अपने जीवन को आनंद, शांति व सफलता की राह पर लगाना है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि बुद्धिमानी का दावा करने वाले हमसे इतना तक नहीं होता?
हमें न सूरज-चांद उगाने हैं, न गुरुत्वाकर्षण ही सम्भालना है। हमें तो अपने खाये भोजन का खून तक नहीं बनाना है। हमें तो सिर्फ अपने जीवन को आनंद, शांति व सफलता की राह पर लगाना है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि बुद्धिमानी का दावा करने वाले हमसे इतना तक नहीं होता?
‘‘मनुष्य’’ जानवरों और पेड़-पौधों से ज्यादा संवेदनशीलता की संभावना लेकर पैदा होता है, परन्तु दुर्भाग्य से वह उसका उपयोग नहीं कर पाता है। क्योंकि वह प्रकृति के साथ जीने के बजाय अपनी बुद्धि से जीने की कोशिश में लगा हुआ है।
एक ‘सुंदर-मन’ वाकई प्रकृति की हजार रचनाओं पर भारी है; और तभी तो सुकरात से लेकर कबीर तक सबका इतना महत्व है।
जीवन के कैसे भी शौक या किसी भी शारीरिक कर्म में कोई बुराई नहीं, यदि सलीके से किये गए हों तो। वैसे ही मंदिर जाने या पूजा करने में भी कोई अच्छाई नहीं। मनुष्य की अच्छाई करुणा, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता व निर्दोषता जैसे गुणों में छिपी हुई है। जबकि सामने स्वार्थ, ईर्ष्या, पक्षपात व जिद्द जैसे अवगुण ही उसकी बुराई है।
प्रकृति में कोई भी मनुष्य परफेक्ट नहीं होता है। हर व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और अपना एक क्षेत्र होता है। हम जिन्हें भगवान कहते हैं वे भी जीवनभर विज्ञान के ज्ञान से अनजान ही थे।
प्रकृति में कोई भी मनुष्य परफेक्ट नहीं होता है। हर व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और अपना एक क्षेत्र होता है। हम जिन्हें भगवान कहते हैं वे भी जीवनभर विज्ञान के ज्ञान से अनजान ही थे।