आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।
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आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।
आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।
जो सब कर रहे हैं वही आप भी कर रहे हैं। फिर रोते क्यों हैं...? जो सबका हो रहा है वह आपका भी हो ही तो रहा है।
जिस व्यक्ति को अपने से ही प्रेम नहीं, भले ही वह अहिंसा के नाम पर मांसाहार न खाए; परंतु उसका चित्त कभी अहिंसक नहीं हो सकता है।
मनुष्य पूर्ण स्वतंत्र है, इसीलिए उसके साथ जो कुछ भी घटता है उसकी जिम्मेदारी उसके स्वयं की होती है। जो व्यक्ति दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है, वह लगातार गलतियां दोहराता रहता है।
दुनिया में दो ही तरीके के लोग सुखी व सफल हो सकते हैं। एक तो वे जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मान ले...फिर तो अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब उसकी मरजी से हो रहा है, बात समाप्त हुई। या तो वे जो मान ले कि ईश्वर है ही नहीं और अपनी सम्पूर्ण जवाबदारी स्वयं उठा ले, बात फिर भी समाप्त हो गयी। लेकिन क्योंकि सभी इन दो पाटनों के बीच में झूला झूल रहे हैं, इसलिए दुःखी व असफल हैं।
आपका ‘मन’ दरअसल तरंगों का जोड़ है। अतः यह कभी भी विज्ञान की पकड़ में नहीं आने वाला। और चूंकि आप अपने सारे सुख-दुःख भी मन के परदे पर ही झेलते हैं, इसलिए विज्ञान कभी भी आपके भीतर कितना दुःख छिपा है या वह कहां से आ रहा है; नहीं बता सकता। ना ही वह कभी Surgery कर उस दुःख को आपके शरीर से अलग कर पाएगा।
दुनिया के हर मॉं-बाप को चाहिए कि वह अपने बच्चों को समझाने, डांटने, शिक्षा देने या कोई राय देने से पहले अपने जीवन में झांक ले कि क्या वो वाकई जीवन में सफल हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चा उनकी उंगली पकड़े बगैर स्वयं के निर्णयों व स्वतंत्रता के दम पर ही उनसे आगे निकलने की संभावना रखता हो।
यदि हम सिर्फ एक क्षण को भी सोचें कि यह तथाकथित धर्म ‘‘झूठी-आशा’’ देने के बदले में पूरी दुनिया से मनुष्य के कितने कीमती संसाधन व कितना मूल्यवान समय खा रहे हैं; तो सारे मंदिरों, मस्जिदों व चर्चों पर आज ही ताले लग जायें और वहां स्कूल व अस्पताल खुल जाएं।
यह सच ही है कि कण-कण में भगवान समाया हुआ है। परंतु समझ यह नहीं आता कि फिर अलग से यह मंदिर क्यों?