दुनिया में दो ही तरीके के कार्यों को शुभ माना जा सकता है। पहला वह जिसमें आपको आनंद की अनुभूति हो रही हो पर दूसरे का कोई नुकसान न हो रहा हो। (ध्यान रहे, इसमें दूसरों के काल्पनिक या अहंकारजनित नुकसान गिनने को नहीं कह रहा) व दूसरा शुभ वह कार्य है जिसे निपटायें तो उससे लाखों लाभान्वित हों।