पहले तो हम सिर्फ मंदिर में जाकर कुछ चढ़ा आते थे। अब तो पंडितों की लालच इतनी बढ़ गयी है कि वे आश्वासनोंें के नाम पर अंगूठी, धागे व प्रतिष्ठान भी बेचकर गरीब जनता को लूटने में लग गए हैं।
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पहले तो हम सिर्फ मंदिर में जाकर कुछ चढ़ा आते थे। अब तो पंडितों की लालच इतनी बढ़ गयी है कि वे आश्वासनोंें के नाम पर अंगूठी, धागे व प्रतिष्ठान भी बेचकर गरीब जनता को लूटने में लग गए हैं।
आपके भीतर दो आधार मजबूती से उपस्थित हैं। एक आपका ‘द्रष्टा’ व दूसरा आपका ‘अहंकार’। अहंकार वह जो सब कुछ कर रहा है व द्रष्टा वह जो सबकुछ होता हुआ देख रहा है।
मनुष्य हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध क्यों है? क्योंकि वह व्यक्तित्व-हीनता के कारण भीड़ में अकेले खड़े होने से घबराता है। ...जबकि ‘‘हिंदू’’ बने रहने पर उसे संबल बना रहता है कि उसके साथ सौ-करोड़ लोग हैं। यही सायकोलॉजी मुस्लिम, ईसाई व बौद्धों की भी है।
आप कितना ‘‘सत्य’’ में जी रहे हैं इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि आप अपने साथ घटनेवाली हर अच्छी-बुरी घटना में कितना हाथ अपना देखते हैं व कितना दूसरों का?
मनुष्य हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध क्यों है? क्योंकि वह व्यक्तित्व-हीनता के कारण भीड़ में अकेले खड़े होने से घबराता है। ...जबकि ‘‘हिंदू’’ बने रहने पर उसे संबल बना रहता है कि उसके साथ सौ-करोड़ लोग हैं। यही सायकोलॉजी मुस्लिम, ईसाई व बौद्धों की भी है।
जीवन के हर क्षेत्र में सम्पूर्ण आत्मनिर्भर होना आपका प्रथम कर्तव्य है। यदि आप किसी भी चीज के लिए किसी पर भी बोझ हैं...तो आपका जीवन व्यर्थ गया।
मनुष्यजन्म लेने के बाद किसी से किसी भी चीज की अपेक्षा करने से बदतर और कुछ नहीं हो सकता। ...सवाल यह कि दूसरा आपकी सहायता करें ही क्यों?
पता नहीं यह मनुष्यरूपी ईश्वर व उसकी काल्पनिक शक्तियों...तथा स्वर्ग-नर्क जैसी कल्पनाओं की शुरुआत कहां से हुई? चाहे जो हो, आज तो यह पांच करोड़ पंडित, पादरी व मौलवियों को रोजगार दिये हुए है।
लक्ष्मी उल्लू पर बैठती है। ...पर यहां तो हम सब सुबह-शाम एक-दूसरे को उल्लू बनाने में लगे हुए हैं। लक्ष्मी बैठे भी तो किस पर?
‘‘चाह’’ की एक खूबी है। आप जो चाहेंगे वह आपको कभी नहीं मिलेगा। विश्वास नहीं होता तो अपने जीवन में झांक के देख लो। आप पायेंगे कि आपने जो चाहा मिला नहीं व जो मिला वह चाहा नहीं।