कोटेशन्स
दीप त्रिवेदी

‘‘बुद्ध’’ समय का वो कमाल है जिनका जन्म भी भारत में हुआ व पैंतालिस वर्षों तक उन्होंने प्रवचन भी भारत में ही दिया। लेकिन उन्होंने हिंदू पाखंडों का विरोध क्या किया, भारत ने उनकी अमूल्य धरोहर को ही भारत से खदेड़ दिया। पिछले दो-हजार वर्ष के भारत के इतिहास में यह उसका सबसे बड़ा नुकसान है।

मजा यह कि जिन देशों ने बुद्ध को अपनाया उन्होंने भी कुछ कम गजब नहीं किया। बुद्ध का भगवान में विश्वास नहीं था। वे हर तरह की पूजा के भी विरोधी थे। ...पर उन्होंने भी उन्हें भगवान बनाकर पूज ही दिया। कौन परवाह करता है कि बुद्ध के दिल पर क्या गुजर रही है?

इस संसार की सर्वोच्च सत्ता ‘‘प्रकृति के नियम’’ है। कृष्ण, क्राईस्ट व बुद्ध भी वे ही हैं जो उसकी शरणागति स्वीकार कर अपना जाती अस्तित्व यानी ‘‘अहंकार’’ मिटा चुके हैं।

सफल मनुष्य-जीवन जीने के लिए मनुष्य के स्वभाव में...एक कलाकार हृदय, वैज्ञानिक दृष्टि, व्यावसायिक बुद्धि, आत्मनिर्भरता का गुमान, आनंद लेने की कला, जीवन संबंधित सारे शौक व अंतःमस्ती; इन सातों स्वभाव का यथायोग्य मिश्रण होना आवश्यक है।

आपके पास अपना धर्म है व अपने ईश्वर हैं। आपका अपना एक देश व समाज है। आप शिक्षित भी हैं व मन में हजारों महत्वाकांक्षा लिये जी भी रहे हैं। परिवार व मित्रों के नाम पर आपके अपने हजारों हितैषी भी हैं। समझ नहीं आता फिर जीवन में इतनी असफलता व दुःख क्यों है? कहीं आप कुदरत के परम नियम अकेले आने व अकेले जाने को तोड़ने का अन्जाम तो नहीं भोग रहे?

इस पूरी प्रकृति में एक Harmony है, उनमें एक आपसी सामंजस्य है। हमारे शरीर के भी सारे अंगों में आपसी तालमेल है। सिर्फ हम ही हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध या ईसाई बने इतराते फिर रहे हैं। जिस दिन हम सिर्फ इन्सान हो जाएंगे, हममें भी आपसी तालमेल बैठ जाएगा।

शुभ-मुहूर्त कोई अलग से देखने की चीज नहीं। समय-संजोग व परिस्थिति बनी नहीं कि वह घड़ी शुभ हुई नहीं। सीधी बात है, मियां-बीबी राजी तो काहे को काजी?

आप सिर्फ इतना क्यों नहीं समझते कि घटनायें बाहर घट रही हैं और आपका जीवन आपके भीतर है। फिर बाहर चाहे जो न क्यों हो जाए, उससे आपका जीवन क्यों प्रभावित होता है? क्योंकि आप उन घटनाओं को जबरदस्ती अपने से जोड़ कर देखते हैं।

आप सिर्फ इतना क्यों नहीं समझते कि घटनायें बाहर घट रही हैं और आपका जीवन आपके भीतर है। फिर बाहर चाहे जो न क्यों हो जाए, उससे आपका जीवन क्यों प्रभावित होता है? क्योंकि आप उन घटनाओं को जबरदस्ती अपने से जोड़ कर देखते हैं।

विज्ञान वस्तुओं की सायकोलोजी के रूपांतरण का नाम है। धर्म मनुष्य की सायकोलोजी को रूपांतरित करनेवाले ज्ञान का नाम है। विज्ञान मनुष्य को भौतिक सुख तो दे सकता है, परंतु मानसिक सुख हेतु तो मनुष्य को अपनी सायकोलोजी रूपांतरित करनी ही रही। अतः दोनों का यथायोग्य समन्वय मनुष्य व संसार दोनों के उत्थान का मार्ग है।

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