कोटेशन्स
दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म जहां के सारे भगवान ‘‘राजा’’ यानी सबको पालने वाले हैं, वह धर्म कैसे दूसरों से मांगकर अपना आश्रम बनाने वाले को धार्मिक मान ले?

प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं, यदि उसे समय के अनुरूप मन की गहराइयों से अपनाया जाए। इसीलिए हिंदू भगवानों व देवताओं ने यहां की हर रचना से प्यार किया। फिर यह हिंदू संन्यासी अपनी कमजोरियां छिपाने हेतु किन चीजों के तिरस्कार को धर्म कह रहे हैं?

धर्मगुरु दुनिया को भ्रमित कर अपनी दुकानें चला रहे, यह तो छोटा गुनाह है। उनका बड़ा गुनाह तो यह कि वे श्रेष्ठ मनुष्यों के गुण व उनकी सोच को दबाकर तथा व्यर्थ के चमत्कारों से उनको जोड़ के अपनी दुकान चला रहे हैं।

क्यों कयामत के दिन का इन्तजार कर इन्साफ हेतु खुदा को तकलीफ देने पर तुले हुए हो? क्यों नहीं आज ही आसपास चल रहे गलत कार्यों पर स्वयं लगाम लगा देते?

ईश्वर की परिभाषा यदि एक वाक्य में करनी हो तो ‘ईश्वर’ वह है जो अपने तीनों Dimensions के साथ...यानी नियम, ऊर्जा व क्रमशः प्रगति की चाह के संग संसार के कण-कण में मौजूद है।

अहंकार संतुलन बनाना जानता ही नहीं। वह या तो संसार में डूबा रहता है या फिर घबराकर संन्यास ले लेता है। ...लेकिन संसार में रहकर मन से संन्यासी होना उसे आता ही नहीं...।

हम पर आनेवाली अधिकांश मुसीबतों में हमारे करने लायक कुछ नहीं होता है। अक्सर वे दूसरों को परेशान करने आयी होती हैं, हम तो घबराकर उसमें अपनी टांग फंसाने के कारण उलझ जाते हैं।

जिसे अपने से प्रेम नहीं वह विश्व में किसी से प्रेम नहीं कर सकता। और जिसे अपने से प्रेम हो वह कम-से-कम धर्म या शिक्षा के नाम पर किसी को सताएगा तो नहीं ही...।

विश्व के अन्य कणों की तरह ‘‘अहंकार’’ को भी मिटाया नहीं जा सकता है। हां, पर उसका आत्मिक गुणों में रूपांतरण अवश्य हो सकता है। ...पर जैसे ही कोई ‘‘बुद्ध’’ उसकी कोशिश करता है, मिटने के डर से अहंकार प्रतिकार को उतर आता है।

‘‘सत्य’’ पल-पल नया व रूपांतरणीय है। अतः हजारों वर्ष पूर्व कही बातें उस वक्त के ‘‘समय, संजोग व परिस्थितियों’’ को देखकर सही हो सकती हैं, पर वे सब आज के भी सत्य हों, कतई जरूरी नहीं।

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