क्या हम हिंदू व भारतीय हैं? किश्चियन व अमेरिकन हैं? ...या फिर हम इस पृथ्वी पर आये एक अद्वितीय मनुष्य हैं? आपका यह फैसला ही आपके जीवन की राह तय करनेवाला सिद्ध होगा।
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क्या हम हिंदू व भारतीय हैं? किश्चियन व अमेरिकन हैं? ...या फिर हम इस पृथ्वी पर आये एक अद्वितीय मनुष्य हैं? आपका यह फैसला ही आपके जीवन की राह तय करनेवाला सिद्ध होगा।
हिंदू धर्म की बुनियाद सहिष्णुता पर रखी हुई है। उसने बुद्ध, कबीर, शंकराचार्य, चाणक्य, दयानंद सरस्वती जैसे उनके वर्तमान पाखंड का विरोध करने वाले सभी का सम्मान किया। ना कि जीसस, सुकरात या मन्सूर जैसे सुधारकों को मारा। फिर यह हिंदू कट्टरता कहां से आयी? ...शायद यह अपनी दुकानें बचाने हेतु हिंदू धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी जा रही है।
हम भी अजीब हैं व हमारे धर्मगुरु भी। हम सिर्फ अपने अहंकार की पूर्ति हेतु अपने धर्म की अच्छाई सुनने उनके पास जाते हैं, व वे सयाने भी इसका ङ्गायदा उठाते हुए हमारा अहंकार सहलाकर अपनी समृद्धि बढ़ाये चले जाते हैं। इससे हम इतने तो अंधे हो जाते हैं कि हमें अपने धर्म की बुराई व दूसरे धर्मों की अच्छाई ही दिखना बंद हो जाती है। यह आपका कितना बड़ा नुकसान है इसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते।
यदि आपको ‘‘समय’’ काटने के रास्ते खोजने पड़ रहे हैं, तो समझ लेना आपका जीवन गलत दिशा में बढ़ रहा है। यदि आपको अपने कार्यों हेतु समय की कमी का एहसास हो रहा है तो ही यकीन जानना कि आपके कदम सही दिशा की ओर बढ़े जा रहे हैं।
हिंदू जगत ने हमेशा ‘धर्म’ को अपने पूर्ण स्वरूप में स्वीकारा है। क्योंकि मोहरहित ‘भगवान’ ने सोमरस से लेकर नृत्य व पाप के विनाश हेतु हिंसा से लेकर संसार तक किसी का भी तिरस्कार नहीं किया। ...फिर यह हिंदू धर्म के ठेकेदार किस बिना पर संसारी व शौकीनों को पापी व अपने को धार्मिक बता रहे हैं?
कोई भी कार्य दूर से जितना कठिन नजर आता है, ध्यान रहे...प्रारंभ करने पर उतना कठिन कभी सिद्ध नहीं होता।
इतिहास में याद भी उसे किया जाता है व पूजा भी उसे ही जाता है जो भीड़ से अलग खड़े होकर ‘‘सत्य’’ कहने का साहस जुटाते हैं। जैसे बुद्ध; जिन्होंने हिंदू घर में पैदा होने के बाद भी तमाम हिंदू-परंपराओं व पाखंडों का विरोध कर बौद्ध विचारधारा स्थापित की। वैसे ही जीसस, जिन्होंने यहूदी घर में पैदा होने के बावजूद यहूदी परंपराओं का विरोध करते हुए अपनी जान गंवाई। या ‘‘कृष्ण’’ जिन्होंने ना सिर्फ हर परंपरा का विरोध किया बल्कि उन्हें जीवनभर तोड़ा भी। क्या अब भी आप हिंदू, मुस्लिम, ईसाई बने रहना चाहते हैं?
हमारा उद्धार हो भी तो कैसे? जब हमारे जीवन की बागडोर ही सौ रुपये में हाथ देखने वाले, दो-सौ में मुहूर्त व पांच-सौ में मूर्तियां बेचने वालों के हाथ में हो।
जो व्यक्ति ‘समय’ को पहचानकर उसके अनुरूप बरतता है...उसका ‘समय’ जल्द ही बदल जाता है।
जीवन में कोई भी मनुष्य सिर्फ बुरा नहीं हो सकता। बुरे-से-बुरे मनुष्य में भी हजार अच्छाइयां तो छिपी ही रहती हैं। मनुष्यों की सिर्फ अच्छाइयों को देखनेवाला परम शांति से जीता चला जाता है।