यहां पर बदलती परिस्थितियों के गणित को समझने वाला वर्तमान में संतुष्ट होकर जीता है। हां, उसकी निगाह बदलती परिस्थितियों पर अवश्य बनी रहती है। ...फलस्वरूप जिस क्षण उसे कुछ भी Ready Platter पर मिलता नजर आता है, वह उस तक को तत्क्षण भुना लेता है।
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यहां पर बदलती परिस्थितियों के गणित को समझने वाला वर्तमान में संतुष्ट होकर जीता है। हां, उसकी निगाह बदलती परिस्थितियों पर अवश्य बनी रहती है। ...फलस्वरूप जिस क्षण उसे कुछ भी Ready Platter पर मिलता नजर आता है, वह उस तक को तत्क्षण भुना लेता है।
‘‘न कुछ पाप है न कुछ पुण्य’’ यह तो स्वयं कृष्ण ने गीता में कई बार कहा। फिर ये संत क्यों रोज-रोज हमें पापों की फेहरिस्त पढ़ा-पढ़ाकर डरा रहे हैं?
‘‘न कुछ पाप है न कुछ पुण्य’’ यह तो स्वयं कृष्ण ने गीता में कई बार कहा। फिर ये संत क्यों रोज-रोज हमें पापों की फेहरिस्त पढ़ा-पढ़ाकर डरा रहे हैं?
‘‘न कुछ पाप है न कुछ पुण्य’’ यह तो स्वयं कृष्ण ने गीता में कई बार कहा। फिर ये संत क्यों रोज-रोज हमें पापों की फेहरिस्त पढ़ा-पढ़ाकर डरा रहे हैं?
प्रकृति व प्राकृतिक वस्तुओं से छेड़छाड़ हमेशा महंगी पड़ती है। हम भी अपने स्वभाव में की जाने वाली छेड़छाड़ का ही भुगत रहे हैं।
प्रकृति व प्राकृतिक वस्तुओं से छेड़छाड़ हमेशा महंगी पड़ती है। हम भी अपने स्वभाव में की जाने वाली छेड़छाड़ का ही भुगत रहे हैं।
विश्व में न तो हीरे को अपने चमकने का गुमान है और न पत्थर को अपने पत्थर होने पर कोई Inferiority ही है। संसार में छाये सारे Complex की जड़ मनुष्य के बुद्धि की उपज है।
परमात्मा को आपके अच्छे-बुरे कर्मों से कोई लेना-देना नहीं। अच्छे-बुरे कर्म अहंकार करता है व उसे भोगता भी वही है। ‘‘द्रष्टारूप परमात्मा’’ को तो सिर्फ यह तमाशा देखना-मात्र होता है।
जीवन हो या व्यवसाय, स्वतंत्रता ही उसे पनपा सकती है। यदि देश का विकास करना है तो Free Economy के अलावा इसका कोई Solution नहीं।
चूंकि हम ताकतवर के सामने क्रोध दबाते हैं, इसीलिए कमजोरों पर मौके-बे मौके क्रोध निकालते रहते हैं।