कार्य का परिणाम आपने क्या व कैसे किया, इससे कहीं ज्यादा आपने कितने विश्वास से किया...इस पर निर्भर है। मुहूर्त व वास्तु निश्चित ही अविश्वास के द्योतक हैं, इसीलिए इनके पदार्पण-मात्र से कार्य असफल हो जाते हैं।
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कार्य का परिणाम आपने क्या व कैसे किया, इससे कहीं ज्यादा आपने कितने विश्वास से किया...इस पर निर्भर है। मुहूर्त व वास्तु निश्चित ही अविश्वास के द्योतक हैं, इसीलिए इनके पदार्पण-मात्र से कार्य असफल हो जाते हैं।
चाहे आपका उससे रिश्ता कुछ भी क्यों न हो, बने वहां तक किसी के जाती जीवन में दखल न दें। क्योंकि अभी आपको स्वयं अच्छे-बुरे की पहचान कहां? जब तक आत्मिक सुख-दुःख व अहंकार के सुख-दुःख का आपको भेद नहीं मालूम, दूसरों के जीवन से दूर ही रहें तो अच्छा है।
आप अपनी कमजोर ‘‘दूरदृष्टि’’ पर गौर तो करें; जिन चीजों को प्राप्त करने हेतु आप इतना उत्साह दिखाते हैं, चन्द दिनों में ही वह आपको कांटों की तरह चुभना प्रारंभ कर देती है।
चूंकि आपने घोड़े की तरह अपनी दोनों आंखों के Side में पट्टी बांध रखी है, इसीलिये आपको अपने धर्म व संस्कृति के अलावा कुछ दिखायी ही नहीं दे रहा; और यही कारण है कि आपके धर्मगुरु आपको हरा चश्मा पहनाकर सूखी-घास खिलाये चले जा रहे हैं।
चूंकि आपने घोड़े की तरह अपनी दोनों आंखों के Side में पट्टी बांध रखी है, इसीलिये आपको अपने धर्म व संस्कृति के अलावा कुछ दिखायी ही नहीं दे रहा; और यही कारण है कि आपके धर्मगुरु आपको हरा चश्मा पहनाकर सूखी-घास खिलाये चले जा रहे हैं।
आप प्रेम हो या व्यवसाय, दान हो या क्रोध, सबकुछ आधे-अधूरे मन से ही करते हैं। ऐसे में आप निर्णायक परिणाम की अपेक्षा ही कैसे रख सकते हैं?
हमारे व बुद्ध, कृष्ण या जीसस में फर्क क्या है? पहले तो वे मन के विकारों से उबरकर उसकी शक्तियों से ओतप्रोत हो गये, और फिर उसी शक्ति को उन्होंने जगत के उद्धार में लगाया। और हम - ऐसे तो निर्गुणी कि खुद ‘अपने उद्धार की शक्ति’ भी नहीं जुटा पा रहे।
हमारे व बुद्ध, कृष्ण या जीसस में फर्क क्या है? पहले तो वे मन के विकारों से उबरकर उसकी शक्तियों से ओतप्रोत हो गये, और फिर उसी शक्ति को उन्होंने जगत के उद्धार में लगाया। और हम - ऐसे तो निर्गुणी कि खुद ‘अपने उद्धार की शक्ति’ भी नहीं जुटा पा रहे।
जिस रोज आप यकीनी तौर पर अपने को इतना गुणी पाएंगे कि विश्व में जीवित या मृत कोई भी मनुष्य जो भी कर सकता है...वह आप भी कर ही सकते हैं; समझ लेना आपका मनुष्य जन्म सफल हो गया।
जैनों को अन्यों की शादियों में भी अपना खाना व अपने खाने के काउंटर अलग से चाहिए। समझ नहीं आता कि वे अच्छे-खासे होने के बावजूद उन्हें इन्सानों के साथ घुलने-मिलने में अड़चन कहां आ रही है?