हमारा ‘मन’ जन्मों-जन्मांतर का है। हमारी बुद्धि इस जनम की है। अतः मन असीमित सोचता है तो बुद्धि सीमित सोचती है। दोनों में कर्मों का एका हो ही नहीं पाता, इसीलिए हम हमेशा दुविधा में रहते हैं।
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हमारा ‘मन’ जन्मों-जन्मांतर का है। हमारी बुद्धि इस जनम की है। अतः मन असीमित सोचता है तो बुद्धि सीमित सोचती है। दोनों में कर्मों का एका हो ही नहीं पाता, इसीलिए हम हमेशा दुविधा में रहते हैं।
हमारा ‘मन’ जन्मों-जन्मांतर का है। हमारी बुद्धि इस जनम की है। अतः मन असीमित सोचता है तो बुद्धि सीमित सोचती है। दोनों में कर्मों का एका हो ही नहीं पाता, इसीलिए हम हमेशा दुविधा में रहते हैं।
जैसे विज्ञान को किसी वस्तु के रूपांतरण हेतु ‘‘ऊर्जा’’ की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही आपको अपना स्वभाव बदलने हेतु भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि आप में ऊर्जा नहीं तो चाहकर भी आप अपने में बदलाव नहीं ला सकते हैं।
जैसे विज्ञान को किसी वस्तु के रूपांतरण हेतु ‘‘ऊर्जा’’ की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही आपको अपना स्वभाव बदलने हेतु भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि आप में ऊर्जा नहीं तो चाहकर भी आप अपने में बदलाव नहीं ला सकते हैं।
मनुष्य को अपने जीवन में "Third Force" की उपस्थिति का कई बार एहसास होता भी है, परंतु वह उसे ईश्वर व भाग्य से जोड़ने के कारण पहचानने में मात खा जाता है।
सीधी बात क्यों नहीं समझते कि मुट्ठीभर लोगों की कट्टरता के कारण मुस्लिम समाज के खिलाफ बोलने या उन्हें सच्ची राह दिखाने को कोई आगे नहीं आ रहा। इससे उनको कितना बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है इसका अंदाजा है किसी को?
पांच वक्त की नमाज पढ़ने से तो अच्छा है दिन में पांच अच्छे कार्य करने की आदत डाल लेना।
एक सच्चा आस्तिक, नास्तिक-सा भासता है; क्योंकि वह आपके धार्मिक पाखंडों व आपके धर्म के दलालों पर हमले बोलता है। वह भी क्या करे, उसका ईश्वर से Direct Contact जो हो जाता है।
एक सच्चा आस्तिक, नास्तिक-सा भासता है; क्योंकि वह आपके धार्मिक पाखंडों व आपके धर्म के दलालों पर हमले बोलता है। वह भी क्या करे, उसका ईश्वर से Direct Contact जो हो जाता है।
एक सच्चा आस्तिक, नास्तिक-सा भासता है; क्योंकि वह आपके धार्मिक पाखंडों व आपके धर्म के दलालों पर हमले बोलता है। वह भी क्या करे, उसका ईश्वर से Direct Contact जो हो जाता है।