मैं तो कहता हूँ बुरे भावों व उनसे किये जाने वाले कर्मों में भी कोई बुराई नहीं। बुरा तो यह कि उससे आप का जीवन दुःख और असफलता से भर जाता है।
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मैं तो कहता हूँ बुरे भावों व उनसे किये जाने वाले कर्मों में भी कोई बुराई नहीं। बुरा तो यह कि उससे आप का जीवन दुःख और असफलता से भर जाता है।
कुदरत की रचना ऐसी है कि जीवन में जो भी हमारे पाने योग्य है या हमारे लिये सुखदायी है वह हमें स्वतः ही मिल सकता है। लेकिन व्यर्थ व दुःखदायी वस्तुओं को पाने की दौड़ में हम उसे ही पाने से चूक जाते हैं।
इस विश्व में छोटे-से-छोटा कण या मच्छर भी अकारण नहीं। यदि इस बह्मांड में कोई बेवजह जिये जा रहा है तो वह मनुष्य के अलावा और कोई नहीं। ...आखिर उससे बुद्धिमान भी तो दूसरा कोई नहीं।
मनुष्य की बुद्धिमत्ता का तो कहना ही क्या? वह रोज सौ योजनाएं अपने आपको मरवाने हेतु खोज ही लाता है।
मनुष्य की बुद्धिमत्ता का तो कहना ही क्या? वह रोज सौ योजनाएं अपने आपको मरवाने हेतु खोज ही लाता है।
समय, संजोग व परिस्थिति की मांग पर सबके हित में जब, जो और जैसा भी करने योग्य हो...वह करने की क्षमता रखने वाला धार्मिक; बाकी सब अधार्मिक।
मनुष्य-जन्म का मूल्य ही ‘‘कर्म’’ करने में है। और कर्तव्य-कर्मों से तो जीते-जी पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। अतः कर्म से भागना व जीवन से भागना एक ही बात है।
कार्य प्रारंभ करने के बाद उसके ‘‘सफल-समापन’’ से पूर्व ही उस ओर से अपनी चेतना हटाना - असफलता को न्योता देने के समान है।
मन के तल पर आत्मविश्वास व क्षमता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मन में विश्वास हो तो बाहर क्षमता झलकती ही है।
चूंकि हम जानतें हैं कि हम गलत कर रहे हैं, इसीलिए हमारे बाबत दूसरों के विचार हमें महत्वपूर्ण जान पड़ते हैं।