यह ‘‘संसार’’ क्रमशः प्रगति के सिद्धांत से फैल रहा है। यह विस्तार ना सिर्फ इसके Time व Space में जारी है, बल्कि चेतना के स्तर पर भी जारी ही है। उसने भी अमीबा से मनुष्य तक का सफर क्रमशः ही तय किया है।
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यह ‘‘संसार’’ क्रमशः प्रगति के सिद्धांत से फैल रहा है। यह विस्तार ना सिर्फ इसके Time व Space में जारी है, बल्कि चेतना के स्तर पर भी जारी ही है। उसने भी अमीबा से मनुष्य तक का सफर क्रमशः ही तय किया है।
जागृत व्यक्ति के लक्षण क्या हैं? एक तो वह सिर्फ अपनी मरजी से जाता और आता है। दूसरा बाहर की दुनिया के कोई कारण उसे प्रभावित नहीं करते। और तीसरा, वह जो कार्य करने की ठान लेता है, उसे पूरा करके ही दम लेता है।
जागृत व्यक्ति के लक्षण क्या हैं? एक तो वह सिर्फ अपनी मरजी से जाता और आता है। दूसरा बाहर की दुनिया के कोई कारण उसे प्रभावित नहीं करते। और तीसरा, वह जो कार्य करने की ठान लेता है, उसे पूरा करके ही दम लेता है।
कर्म को शरीर से जोड़कर देखना निम्नतम स्तर की बुद्धि का काम है। इसमें उपवास करने से लेकर कड़ी मेहनत करने जैसी तमाम वस्तुओं का समावेश हो जाता है। श्रेष्ठ बुद्धि कर्म को भाव से जोड़कर देखती है। भाव शुद्ध - कर्म शुभ। परंतु परमज्ञानी ‘‘कर्म’’ को परिणाम से जोड़कर देखता है। आपके कर्म का जो अंतिम परिणाम आया, वही आपकी ‘‘मंशा’’।
कोई कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, चाहे उसकी आपके प्रति कैसी ही उच्च भावना क्यों न हो...या फिर उसे आप भगवान ही क्यों न मानते हों; उसे भी इतनी सत्ता नहीं कि वह आपके सुख-समृद्धि का कोई स्थायी उपाय कर सके।
हर कोई अपनी जाति व धर्म पर गुमान किये फिरता है। मेहरबानी कर एकबार स्वयं को व अपने आसपास वालों को ध्यान से देख लेना - गुमान स्वतः छू हो जाएगा। और तब कहीं जाकर आप विश्व को अपनाकर उन्नति के रास्ते पर लग सकेंगे।
हर कोई अपनी जाति व धर्म पर गुमान किये फिरता है। मेहरबानी कर एकबार स्वयं को व अपने आसपास वालों को ध्यान से देख लेना - गुमान स्वतः छू हो जाएगा। और तब कहीं जाकर आप विश्व को अपनाकर उन्नति के रास्ते पर लग सकेंगे।
जीवन में आयी हर समस्या से खुद नहीं निपटना होता है। उनमें से अधिकांश को तो कुदरत के न्याय पर छोड़कर चैन से सो जाने में ही हमारी भलाई होती है।
बुद्ध, कृष्ण, जीसस या मोहम्मद की करुणा में कोई कमी नहीं। वे कर सकते होते तो मनुष्य के ‘‘दुःख-दर्द’’ कब के दूर कर चुके होते। लेकिन दिक्कत यह कि इस हेतु हमें अपनी सहायता स्वयं करनी होती है।
‘बचपना’ मनुष्य का वह सबसे हसीन गुण है जो मरते दम तक छोड़ने जैसा नहीं। लेकिन जो बच्चे बचपन से ही गंभीर रहने के आदी हों, उनका तो भगवान भी मालिक नहीं।