इस संसार में प्रेम का रिश्ता सिर्फ दो पूर्णतः आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच ही शक्य है। सवाल यह कि दो ऐसे व्यक्ति साथ रहेंगे ही क्यों?
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इस संसार में प्रेम का रिश्ता सिर्फ दो पूर्णतः आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच ही शक्य है। सवाल यह कि दो ऐसे व्यक्ति साथ रहेंगे ही क्यों?
‘‘निर्विचार मनोदशा’’ का व्यक्ति ही जीवन में मनुष्य की तरह जी सकता है। लेकिन यदि आपकी कोई जिद है या आपके कुछ सिद्धांत हैं या फिर आपका कोई स्थिर स्वभाव है, तो दूसरे मनुष्य आपका उपयोग वस्तु की तरह करते चले जाएंगे।
यदि हमेशा आनंद में रहना चाहते हो तो जीवन के संघर्षों से भी एक खेल मानकर उलझो। देखें; संघर्ष हमसे जीतता है या हम संघर्ष से?
यदि हमेशा आनंद में रहना चाहते हो तो जीवन के संघर्षों से भी एक खेल मानकर उलझो। देखें; संघर्ष हमसे जीतता है या हम संघर्ष से?
यह मत समझना कि विषय ‘चिंता’ का है, इसीलिए आपको चिंता पकड़ रही है। क्योंकि समान खबर पर हर व्यक्ति की चिंता की तीव्रता भिन्न-भिन्न होती है।
जीवन हो या व्यवसाय, आगे वही बढ़ता है जो ना सिर्फ जहां खड़ा है वहां दृढ़ता से खड़ा रहता है, बल्कि उसी से संतुष्ट भी रहता है।
जीवन हो या व्यवसाय, आगे वही बढ़ता है जो ना सिर्फ जहां खड़ा है वहां दृढ़ता से खड़ा रहता है, बल्कि उसी से संतुष्ट भी रहता है।
जैसे Space Shuttles को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने हेतु एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है; वैसे ही मन को बुद्धि के प्रभाव से मुक्त करने हेतु हमें भी एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है।
जैसे Space Shuttles को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने हेतु एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है; वैसे ही मन को बुद्धि के प्रभाव से मुक्त करने हेतु हमें भी एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है।
‘अपने’ मन की कार्यप्रणाली समझने वाला जल्द ही सबके मन समझ जाता है। इसी से वह दूसरों पर राज करता है। हम व्यर्थ ही जीवनभर अपने बजाय दूसरों के मन समझने में लगे रहते हैं।