अपना मन जाने बगैर जीवन की कोई सफलता हासिल नहीं की जा सकती। लेकिन मन समझने हेतु ना तो किताबें उपलब्ध हैं ना शिक्षाएं ही। मनुष्य की इतनी असफलता का यही एक कारण है।
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अपना मन जाने बगैर जीवन की कोई सफलता हासिल नहीं की जा सकती। लेकिन मन समझने हेतु ना तो किताबें उपलब्ध हैं ना शिक्षाएं ही। मनुष्य की इतनी असफलता का यही एक कारण है।
समय के अनुरूप आप अपने को ढालते चले जाएं व परिस्थितियों के साथ स्वयं को बहाते चले जाएं, देखिये आप क्या से क्या हो जाते हैं।
जीते-जी मां-बाप का ध्यान क्यों नहीं रख लेते, जो मृत्यु पश्चात् ‘गिल्टी-वश’ उनका श्राद्ध करना प़ड़ता है।
कभी आपने सोचा कि मान और अपमान में फर्क ही क्या है? मान वह जो दूसरा आपको देता है व अपमान वह जिससे दूसरा कुछ आप में से छीनने की कोशिश करता है। इस तरह दोनों कर्मों का ‘कर्ता’ तो दूसरा ही है... उससे आपका क्या?
सफल व्यक्ति चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, वह सायकोलोजी का मास्टर होता है। सफलता का सार-सूत्र ही यह है कि वह अपनी बातों व कार्यों से दूसरों को प्रभावित कर पा रहा है।
समस्या कितने ही विकराल स्वरूप में प्रकट क्यों न हो जाए, उसका कोई-न-कोई उपाय Time या Space में होता ही है। सवाल बिना घबराये मन की गहराइयों से उसपर चिंतन करने का ही है।
मनुष्य जीवन का एक ही सत्य है कि साठ वर्ष बाद उसे इस संसार को अलविदा कहकर जाना है। ....ऐसे में उसका एक ही कर्तव्य बचता है कि वह अपने आने के ऐतिहासिक पदचिह्न इस संसार में छोड़कर ही मरे।
यदि वाकई गंगा में डुबकी लगाते ही ‘पाप’ धुल जाते हैं, तो फिर बेचारे Criminals को क्यों जेलों में ठूंसा जा रहा है। गंगा में डुबकी लगवाकर उनके भी ‘पाप’ क्यों नहीं धो दिये जाते हैं?
यदि वाकई गंगा में डुबकी लगाते ही ‘पाप’ धुल जाते हैं, तो फिर बेचारे Criminals को क्यों जेलों में ठूंसा जा रहा है। गंगा में डुबकी लगवाकर उनके भी ‘पाप’ क्यों नहीं धो दिये जाते हैं?
यदि अन्यों से हम अपने को विशिष्ट मानकर व्यवहार करने की अपेक्षा छोड़ दें तो हमारे सारे दुःख तिरोहित हो जायें। जब बुद्ध से लेकर जीसस तक के श्रेष्ठ ऐतिहासिक पुरुषों को अपने समय में किसी ने नहीं समझा तो आप क्यों ‘‘आपको कोई समझे’’...उसकी अपेक्षा किये बैठे हैं?