समझ नहीं आता कि यह जैन मुनि अच्छे खाने, अच्छे कपड़े पहनने से लेकर अच्छे से नहाने व खुशबूदार रहने को भी कैसे पाप कहते हैं? फिर तो उनके अनुसार सारे जानवर वैसे ही ‘‘पक्के जैन’’ हो गये।
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समझ नहीं आता कि यह जैन मुनि अच्छे खाने, अच्छे कपड़े पहनने से लेकर अच्छे से नहाने व खुशबूदार रहने को भी कैसे पाप कहते हैं? फिर तो उनके अनुसार सारे जानवर वैसे ही ‘‘पक्के जैन’’ हो गये।
जितना आप प्राकृतिक हो के जीते हैं उतनी ही आपको प्रकृति से ऊर्जा मिलती है। ध्यान रहे कि जीवन को सफल बनाने हेतु आपकी अपनी ऊर्जा बहुत कम पड़ती है।
जितना आप प्राकृतिक हो के जीते हैं उतनी ही आपको प्रकृति से ऊर्जा मिलती है। ध्यान रहे कि जीवन को सफल बनाने हेतु आपकी अपनी ऊर्जा बहुत कम पड़ती है।
यदि आप अपने ‘होनेपन’ व ‘स्वभाव’ को अलग-अलग पहचान लेंगे, तो उसके बाद आपके जीवन में कभी कोई समस्या नहीं आएगी।
हमें समझना यह है कि जीवन को बढ़ाने के लिये डिग्रियां ज्यादा सहायक है कि Concentration। बुद्ध से लेकर एडीसन तक को देखने पर तो Concentrationही ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है।
दुनिया के बुद्धिमानों को धर्म में इतनी अरुचि क्यों हो गयी? क्योंकि बुद्ध, जीसस व कृष्ण के नाम पर उनको इन महापुरुषों की बातों के बदले धर्मगुरुओं ने अपने द्वारा रचित बाइबल व वेद वगैरह उन तक पहुंचाए।
चाहे जितना ही बुरा आपके साथ घट गया हो पर उसे स्वीकारने के अलावा आपके पास उपाय ही क्या है? ...कुछ अन्य उपाय हो तो मुझे भी बताना।
प्रकृति का मनुष्य के जीवन में कोई Interference नहीं। प्रकृति की ओर से वह पूर्णरूपेण स्वतंत्र है। इस लिहाज से अपने सुख-दुःख का जिम्मेदार मनुष्य स्वयं नहीं तो और कौन है?
मनुष्य के सारे दुःख-दर्दों की जड़ उसके ‘मन’ के उपद्रव हैं। अतः विश्व में से ‘‘दुःख-दर्द’’ गायब करने का एक ही उपाय है कि मनुष्य को ‘मन’ की कार्यप्रणाली बाबत ठीक से शिक्षित किया जाए।
जैसे ही हवाईजहाज का आविष्कार हुआ कि कहने वाले आ गये कि यह हमारे ‘राम’ के पास तो पहले से था। सवाल यह कि इन बातों से हासिल क्या हो रहा? घूमना तो आज भी हमें ‘राईट-ब्रदर्स’ के ईजाद किये हवाईजहाजों में ही पड़ रहा है।