हमारे मन रूपी कण में ईश्वर अपने तीनों Dimensions के साथ पूरी दृढ़ता से उपस्थित है।
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हमारे मन रूपी कण में ईश्वर अपने तीनों Dimensions के साथ पूरी दृढ़ता से उपस्थित है।
अगले क्षण क्या करना यह इस क्षण तय कर लेना प्रकृति के खिलाफ जाना है। आश्चर्य है लोग-बाग तो बड़े होकर क्या बनना से लेकर कब मंदिर जाना व कब उपवास व रोजे रखना यह भी तय कर लेते हैं। अब प्रकृति के इतने खिलाफ जाओगे तो उसके कोप का भाजन तो बनना ही पड़ेगा।
अगले क्षण क्या करना यह इस क्षण तय कर लेना प्रकृति के खिलाफ जाना है। आश्चर्य है लोग-बाग तो बड़े होकर क्या बनना से लेकर कब मंदिर जाना व कब उपवास व रोजे रखना यह भी तय कर लेते हैं। अब प्रकृति के इतने खिलाफ जाओगे तो उसके कोप का भाजन तो बनना ही पड़ेगा।
मस्ती की परिभाषा क्या है? आप जो करना चाहते हैं वह करने को मिल जाता है, तो उस समय आप जो अनुभव करते हैं उस अनुभव का नाम ‘‘मस्ती’’ है।
कृष्ण की पूजा करने से भगवद्गीता समझना बुद्धिमत्ता है।
कृष्ण की पूजा करने से भगवद्गीता समझना बुद्धिमत्ता है।
जीवन हो या व्यवसाय ‘‘संतोष’’ सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। एक तो इससे आपकी पीछे हट नहीं होती, दूसरा लोभ व महत्वाकांक्षा के अभाव में आप उटपटांग कार्यों में लग चारों खाने चित नहीं होते व तीसरा शांति से बैठे होने के कारण आपको आगे बढ़ने के सुनहरे मौके दिखाई भी दे जाते हैं।
जब हमारा जीवन वैज्ञानिकों की ईजाद की हुई लाखों वस्तुओं पर निर्भर है, जब हमारे जीवन में सुकून, शांति व आनंद महान कलाकारों की वजह से है; तो उन्हें कैसे हम किसी कृष्ण, बुद्ध या क्राइस्ट से कम आंक सकते हैं?
हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?
हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?