आपको हजार काम छोड़ आपके व परम-सत्ता के बीच संवाद स्थापित करना है। संवाद स्थापित होते ही आपके सारे भ्रम टूट जाएंगे। और जिसको कोई ‘‘भ्रम’’ ही न रहा उसे सफलता के शिखर छूने से कौन रोक सकता है?
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आपको हजार काम छोड़ आपके व परम-सत्ता के बीच संवाद स्थापित करना है। संवाद स्थापित होते ही आपके सारे भ्रम टूट जाएंगे। और जिसको कोई ‘‘भ्रम’’ ही न रहा उसे सफलता के शिखर छूने से कौन रोक सकता है?
आपको हजार काम छोड़ आपके व परम-सत्ता के बीच संवाद स्थापित करना है। संवाद स्थापित होते ही आपके सारे भ्रम टूट जाएंगे। और जिसको कोई ‘‘भ्रम’’ ही न रहा उसे सफलता के शिखर छूने से कौन रोक सकता है?
जो मनुष्य अपने जीवन के सफलता या असफलताओं की जवाबदारी स्वयं ले...वह धार्मिक। जो यह जवाबदारी पूजा-पाठ, ज्योतिष, वास्तु, परिवार या मित्रों को सौंपे...वह अधार्मिक।
बुद्धि यदि आपके जीवन के विचारों का केन्द्र है तो Liver आपके शरीर का केन्द्र है। जैसे बुद्धि बिना उपयोग किए जड़ हो जाती है, वैसे ही लगातार सादा व कम खाने से Liver भी कमजोर हो जाता है।
यह प्रकृति चारों ओर से दो-विरोधाभासों से संतुलित है। पृथ्वी पर जितने उभार हैं, उतनी ही गहरी खाइयां हैं। जितना विशाल Space है उतना ही विशाल Time है। यहां जितनी Negative शक्ति है उतनी ही Positive शक्ति भी है। ...बस प्रकृति को उसका यह Balance ही उसे टिकाये हुए है। और हमारा यह हाल इसलिए है कि हम अपना यह Balance बिगाड़ चुके हैं।
यह प्रकृति चारों ओर से दो-विरोधाभासों से संतुलित है। पृथ्वी पर जितने उभार हैं, उतनी ही गहरी खाइयां हैं। जितना विशाल Space है उतना ही विशाल Time है। यहां जितनी Negative शक्ति है उतनी ही Positive शक्ति भी है। ...बस प्रकृति को उसका यह Balance ही उसे टिकाये हुए है। और हमारा यह हाल इसलिए है कि हम अपना यह Balance बिगाड़ चुके हैं।
मनुष्य के ‘आत्मिक दुःख’ दूर कर पाना एकबार को मनोविज्ञान के हाथ में तो है, पर मनुष्य के अपने अहंकार से जनित दुःख दूर कर पाना किसी के वश में नहीं। उसमें तो सिवाय उसके कोई और उसकी सहायता कर ही नहीं सकता।
कैसे भी विपरीत हालात क्यों न हो, जीवन में ‘‘कर्मों’’ से पीछे कभी मत हटो। शरीर थक जाए तो उसे मन की शक्ति प्रदान करो। मन भी थक जाए तो उसे आत्मबल से खींचो। ...पर हाथ में लिया कार्य तो निपटाकर ही छोड़ो।
जीवन के सारे प्रयत्न अंत में जीवन में आने वाले सुख-दुःखों को न्यौता देने के अलावा कुछ नहीं। जबकि आपके ‘होनेपन’ में स्थिर होने हेतु किसी प्रयत्न की आवश्यकता नहीं। और मजा यह कि वहां एक नहीं हजार कारण से सिर्फ आनंद-ही-आनंद है।
विकट परिस्थितियों से जूझने का एक ही सिद्धांत है। ...जो कर सकते हैं - हाथोंहाथ करें, उपाय खत्म होते ही इन्तजार करें...और इन्तजार के बाद भी कोई नया उपाय न सूझे तो उसे स्वीकार कर आगे की सोचें।