कोटेशन्स
दीप त्रिवेदी

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

इस जगत में चाह से परिणाम आ जाते होते तो - तो किसी की चाह में कोई कमी नहीं।

दूसरों के जीवन में उतार-चढ़ाव आने से आपको फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि आप जानते हैं वह दूसरा है। आप चाहें तो अपने ‘होनेपन’ को ‘अपने’ से अलग कर देख सकते है, फिर दूसरों की ही तरह आपके जीवन के उतार-चढ़ाव भी आपको प्रभावित नहीं करेंगे।

दूसरे का कुछ अच्छा करने से पहले मनुष्य को आत्मिक सुख व अहंकार के सुख का फर्क पता होना जरूरी है। यदि दूसरे के अहंकार के साथ छेड़छाड़ की तो उसके साथ-साथ आप भी बुरी तरह फंस जाएंगे।

क्या आप अपनी मन-रूपी धरती को स्थिर नहीं रख सकते? रख सकते हैं, यदि आप अपना ध्यान जीवन में आने वाले सुख-दुःखों से हटाकर मात्र अपने ‘‘होनेपन’’ पर स्थिर रख सकें।

क्या आप अपनी मन-रूपी धरती को स्थिर नहीं रख सकते? रख सकते हैं, यदि आप अपना ध्यान जीवन में आने वाले सुख-दुःखों से हटाकर मात्र अपने ‘‘होनेपन’’ पर स्थिर रख सकें।

मनुष्य की Intelligence की Highest ऊंचाई ‘‘मन का विज्ञान’’ समझना है। उससे थोड़ा नीचे की Intelligence "Time & Space" के सिद्धांत व उसके प्रभाव समझने में है। आश्चर्य यह कि यह दो न जानने वाले भी अपने को बुद्धिमान मानते हैं।

आप सीधा समझें कि यहां आपके समेत सभी चीजें सिर्फ हैं। चाहे वह सुख-दुःख हो या अच्छाई-बुराई। तो फिर आप पक्ष लेने के बजाय यह तमाशा देखने का आनंद क्यों नहीं लूटते?

कोई भी मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो, या फिर वह कितनी ही करुणा से क्यों न भरा हो; उसके लिये भी शरीर अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। हमारी ही तरह बीमार उनका शरीर भी पड़ता है; और जहर पिलाये जाने या सूली पर लटकाये जाने पर मृत्यु उनकी भी होती ही है। फिर भी उन्हें चमत्कारों से जोड़ना उनके व्यक्तित्व से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है?

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