‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।
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‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।
हमारे ‘‘मन’’ में उठनेवाली कोई भी तरंग ना तो दबायी जा सकती है, और ना मन में कोई तरंग पैदा ही की जा सकती है। ...उनका सिर्फ रूपांतरण हो सकता है।
बाहर की दुनिया से आपका मन चाहे जो ग्रहण करेगा, वह जीवन को सिर्फ पीछे ले जाने वाला सिद्ध होगा। भीतर से आपका मन जो और जितना प्रकट करेगा, वही जीवन को आगे बढ़ाने वाला सिद्ध होगा।
बुद्धिमान वह नहीं है जिसे पानी का Formula यानी H2O मालूम है। बुद्धिमान वह है जिसे कब प्यास लगी यह मालूम है व कितना पानी पीना इसका एहसास है।
हमारे मन की गहराइयों का प्रकृति से "Auto Tuning'' है। एक बार जिसने उन गहराइयों से जीना चालू कर दिया...फिर उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता।
The concept of "God" भय के कारण अस्तित्व में आया है। ‘भय’ असुरक्षा व चाह से पैदा हुआ है। ...मजा यह कि इन दोनों की मृत्यु के बाद कोई जरूरत नहीं।
The concept of "God" भय के कारण अस्तित्व में आया है। ‘भय’ असुरक्षा व चाह से पैदा हुआ है। ...मजा यह कि इन दोनों की मृत्यु के बाद कोई जरूरत नहीं।
‘‘भाग्य’’ सिवाय अपनी असफलता छिपाने के एक खूबसूरत बहाने से ज्यादा और कुछ नहीं।
जीवन को आगे बढ़ाने का रहस्य सिर्फ आपका ‘मन’ जानता है। मन और बुद्धि का कोई Communication नहीं। अतः जो बातें आपकी बुद्धि को आगे बढ़ने वाली जान पड़े, समझ लेना वह पीछे धकेल देगी; व जो पीछे ले जाने वाली मालूम पड़े, समझ लेना उसी के सहारे आप सफलता के शिखर छू पाएंगे।
जीवन को आगे बढ़ाने का रहस्य सिर्फ आपका ‘मन’ जानता है। मन और बुद्धि का कोई Communication नहीं। अतः जो बातें आपकी बुद्धि को आगे बढ़ने वाली जान पड़े, समझ लेना वह पीछे धकेल देगी; व जो पीछे ले जाने वाली मालूम पड़े, समझ लेना उसी के सहारे आप सफलता के शिखर छू पाएंगे।