मनुष्य के मन की श्रेष्ठ स्थिति दो विरोधाभासों से ही संतुलित होती है। लेकिन हम बुद्धि के चक्कर में एक को अपनाने व दूसरे को छोड़ने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारा अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब इसी से परिभाषित है।
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मनुष्य के मन की श्रेष्ठ स्थिति दो विरोधाभासों से ही संतुलित होती है। लेकिन हम बुद्धि के चक्कर में एक को अपनाने व दूसरे को छोड़ने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारा अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब इसी से परिभाषित है।
मनुष्य के मन की श्रेष्ठ स्थिति दो विरोधाभासों से ही संतुलित होती है। लेकिन हम बुद्धि के चक्कर में एक को अपनाने व दूसरे को छोड़ने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारा अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब इसी से परिभाषित है।
जो मनुष्य मन का संतुलन बिठाना जानता है, वही जीवन में सफल व सुखी हो सकता है। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा यह सब हमारे मन के संतुलन बिगाड़ने की शिक्षाएं हैं, और दुर्भाग्य से यही सब हमारे धार्मिक गुरु व शास्त्र हमें धड़ल्ले से देने में लगे हुए हैं। परिणाम यह कि सुखी व सफल लाखों में कोई एक ही हो पा रहा है; और वह भी वो जो उनके चंगुल से बच निकलता है।
मंदिर-मस्जिद-चर्च न जाने वाले करोड़ों-करोड़ लोग इस विश्व में जी रहे हैं, और हकीकत यह है कि वे ज्यादा चैन व मजे से जी रहे हैं। लेकिन संसार का कोई भी व्यक्ति आज ‘‘विज्ञान’’ के उपयोग के बगैर नहीं जी रहा। जी के देख लें, ‘नर्क’ किसे कहते हैं...पता चल जाएगा।
इस Infinite "Time व Space" के जगत में आपने अपने छः फूट के शरीर का 60 वर्ष के लिए आने का मकसद नहीं जाना, तो बाकी जो भी किया-करा-जाना; सब बेकार।
इस Infinite "Time व Space" के जगत में आपने अपने छः फूट के शरीर का 60 वर्ष के लिए आने का मकसद नहीं जाना, तो बाकी जो भी किया-करा-जाना; सब बेकार।
इस Infinite "Time व Space" के जगत में आपने अपने छः फूट के शरीर का 60 वर्ष के लिए आने का मकसद नहीं जाना, तो बाकी जो भी किया-करा-जाना; सब बेकार।
विकासशील राष्ट्रों के प्रतिभाशाली व्यक्तियों को स्वयं ही खुद को International Level पर Promote करना पड़ता है। इससे बेचारों की अच्छी-खासी शक्ति इसी में व्यर्थ हो जाती है।
हम गलत शिक्षाओं के कारण जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, आत्मविश्वास, उत्साह, Concentration और दूरदृष्टि जैसे महत्त्वपूर्ण गुण खोते चले जाते हैं। वरना बच्चों के तो यह सब स्वाभाविक गुण होते हैं। ऐसे में क्या हमें अपनी शिक्षा-पद्धति पर दोबारा गौर करने की आवश्यकता नहीं?
‘हां’ आस्तिकता है और ‘ना’ नास्तिकता है। आपने जीवन में जितनी चीजों का दृढ़तापूर्वक निषेध कर रखा है...उतने ही आप अधार्मिक। अधार्मिकता का अर्थ ही ईश्वर की रचनाओं का अस्वीकार है।