हिंदू धर्म ने नरमुंडों की माला पहनने वालों से लेकर सोमरस, भांग व नृत्य के शौकीनों को भी भगवान स्वीकारा। क्योंकि हिंदू धर्म वस्तुओं का निषेध नहीं, उन्हें ग्रहण करने के सलीके सिखाने में विश्वास करता है।
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हिंदू धर्म ने नरमुंडों की माला पहनने वालों से लेकर सोमरस, भांग व नृत्य के शौकीनों को भी भगवान स्वीकारा। क्योंकि हिंदू धर्म वस्तुओं का निषेध नहीं, उन्हें ग्रहण करने के सलीके सिखाने में विश्वास करता है।
नफरत व तिरस्कार, फिर चाहे वह वस्तु से हो या व्यक्ति से; ‘हिंदू’ धर्म में कोई स्थान नहीं। ...जबकि यह So-called हिंदू संत आपमें व्यर्थ के ‘पापभाव’ पैदा कर अपने आश्रम फैलाये चले जा रहे हैं। कैसे तो आप हिंदू व कैसे तो यह हिंदू संत?
‘‘वक्त’’ वह धार है जो ‘‘कृष्ण’’ जैसे सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व को भी मौत की नींद सुला देता है। लेकिन उनका जीया जीवन व उनकी कही भगवद्गीता उन्हें अमर बना देती है। मरना आपको भी है, फिर कुछ ऐसा कर के क्यों नहीं मरते कि मर के भी न मरो।
‘‘वक्त’’ वह धार है जो ‘‘कृष्ण’’ जैसे सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व को भी मौत की नींद सुला देता है। लेकिन उनका जीया जीवन व उनकी कही भगवद्गीता उन्हें अमर बना देती है। मरना आपको भी है, फिर कुछ ऐसा कर के क्यों नहीं मरते कि मर के भी न मरो।
हिंदूओं ने भगवान ही उन्हें स्वीकारा जिन्होंने पापियों का नाश किया। हम भी क्यों न उन्हें सीधी राह पर ले आएं ‘‘जो’’ हमारे ही खून-पसीने की कमाई से स्वयं के आश्रम फैलाने में लगे हुए हैं। ...यदि आपने यह कमाल कर दिखाया तो आपके भारत को विश्व का ‘‘नंबर-वन’’ राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।
हिंदूओं ने भगवान ही उन्हें स्वीकारा जिन्होंने पापियों का नाश किया। हम भी क्यों न उन्हें सीधी राह पर ले आएं ‘‘जो’’ हमारे ही खून-पसीने की कमाई से स्वयं के आश्रम फैलाने में लगे हुए हैं। ...यदि आपने यह कमाल कर दिखाया तो आपके भारत को विश्व का ‘‘नंबर-वन’’ राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।
आप जीवन में लगातार श्रेष्ठ निर्णय लेना चाहते हैं तो कुछ पाने के ‘‘लोभ’’ या कुछ खोने के ‘‘डर’’ से निर्णय लेना छोड़ दें।
‘‘कर्म करो पर फल की चिंता मत करो’’...बात कृष्ण की सौ फीसदी सही है। वे यही कह रहे हैं कि जो करो उससे सिर्फ आनंद उत्पन्न होना चाहिए। क्योंकि आनंदपूर्वक किया कर्म ही एक ऐसा कर्म है जिसके प्रतिफल में भी सिर्फ आनंद ही पैदा होता है...और वह भी हाथों-हाथ।
‘‘कर्म करो पर फल की चिंता मत करो’’...बात कृष्ण की सौ फीसदी सही है। वे यही कह रहे हैं कि जो करो उससे सिर्फ आनंद उत्पन्न होना चाहिए। क्योंकि आनंदपूर्वक किया कर्म ही एक ऐसा कर्म है जिसके प्रतिफल में भी सिर्फ आनंद ही पैदा होता है...और वह भी हाथों-हाथ।
मनुष्य के लिए उसके अपने जीवन हेतु सबसे ज्यादा कीमती समय, शक्ति व धन है। धार्मिक क्रियाएं इन तीनों का जमकर शोषण करती हैं।