मनुष्य जन्म लिया है तो कर्म करना एकमात्र ‘‘पूजा’’ है, और कर्तव्य-कर्म निभाना एक मात्र ‘‘ध्यान’’ है। अलग से पूजा या ध्यान वे लोग करते हैं जो कर्मों से विमुख हो चुके हैं।
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मनुष्य जन्म लिया है तो कर्म करना एकमात्र ‘‘पूजा’’ है, और कर्तव्य-कर्म निभाना एक मात्र ‘‘ध्यान’’ है। अलग से पूजा या ध्यान वे लोग करते हैं जो कर्मों से विमुख हो चुके हैं।
स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो चालीस वर्ष तक डटकर खाएं व जमकर व्यायाम करें। हमारे दादा-पापा यही करते थे। हमने चरबी वाले खाने व Acidic Food को अलग से पहचाना और जिसके परिणामस्वरूप आज का युवा डर-डरकर खाने लगा। परिणाम में आजकल बच्चों की सेवा बाप-दादाओं को करनी पड़ रही है।
यह नहीं है कि अधिकांश प्रतिभावान अमेरिका में है। उनमें से अधिकांश तो वे हैं जो दूसरे देशों से आये हुए हैं व जिन्होंने वहां की नागरिकता स्वीकार की हैं। अन्य कई ऐसे हैं जिन्हें अच्छे से प्रॅमोट किया गया है।
बड़े कार्य ऊंची महत्वाकांक्षाओं के चलते नहीं, बल्कि उच्च कोटि के ध्यान व बड़े पैमाने की कटिबद्धता के सहारे निपटाये जाते हैं।
जीवन सिर्फ वर्तमान है। यहां बीता क्षण कभी लौट के नहीं आ सकता। वहीं आने वाला पल भी कभी कुछ कह के नहीं आता। ऐसे में भूत व भविष्य की सारी उड़ानें सिर्फ हमारे भय की द्योतक हैं, यथार्थ इसमें कुछ भी नहीं होता।
मैं आपके उन धर्म गुरुओं में से हूँ जिसने जैसे ही पाया कि मुझ में आगे बढ़ने के कोई गुण जैसे कला, विज्ञान, मेहनत करने की लगन या डिग्री कुछ भी नहीं; तो मैंने आश्वासनों व आशीर्वादों की दुकान खोल ली। ...और देखो आज मेरे पास एकड़ों में जमीन, अपना आश्रम व आप जैसे हजारों बुद्धिमान श्रद्धालु हैं।
आनंद, शांति, संतोष, करुणा, स्वतंत्रता, ध्यान, वगैरह गुण आपको मन की उन भीतरी कुदरती शक्तियों में ले जाते हैं...जहां से आपके ‘‘ऐतिहासिक व्यक्ति’’ बनने की नींव डलती है।
हम यह सीधा सत्य क्यों नहीं समझते कि हमें अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सिर्फ अपने साथ बिताना होता है। फिर क्यों हम किसी मनुष्य या वस्तु पर निर्भर हो दुःख को आमंत्रित करते हैं? भला अपने आनंद हेतु दूसरों पर निर्भर रहने वाला कभी खुश हो ही कैसे सकता है?
मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।
मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।