मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।
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मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।
मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।
मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।
समय के सिर्फ एक स्वरूप यानी ‘वर्तमान’ से प्रकाशित इस जगत में कैसे एक पल से ज्यादा बटोरने की कोशिश में लगा कोई व्यक्ति कभी भी सफल हो सकता है?
क्या आप ‘करने’ और ‘होने’ का फर्क जानते हैं? आपको जीवन में जितना करना पड़ रहा है वह आपकी अशक्ति व गुलामी को दर्शाता है, व जितना आप से ‘‘हो रहा है’’ कायदे से तो बस उतना ही आप जी रहे हैं।
क्या आप ‘करने’ और ‘होने’ का फर्क जानते हैं? आपको जीवन में जितना करना पड़ रहा है वह आपकी अशक्ति व गुलामी को दर्शाता है, व जितना आप से ‘‘हो रहा है’’ कायदे से तो बस उतना ही आप जी रहे हैं।
क्या आप ‘करने’ और ‘होने’ का फर्क जानते हैं? आपको जीवन में जितना करना पड़ रहा है वह आपकी अशक्ति व गुलामी को दर्शाता है, व जितना आप से ‘‘हो रहा है’’ कायदे से तो बस उतना ही आप जी रहे हैं।
एडीसन से प्रयोग होते हैं इसी से वह एडीसन है। हमें कार्य करने पड़ते हैं, इसीलिए हम असफल हैं। जबकि बुद्ध, कृष्ण व जीसस वे हैं जिनसे सबकुछ हो रहा है।
राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।
राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।