बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।
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बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।
बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।
बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।
जिस परिवार में बोलने व क्रोध करने की स्वतंत्रता है, वहां भले ही छोटे-मोटे झगड़े रोज होते होंगे पर उनमें बड़ा झगड़ा कभी नहीं होगा। जीवन की सारी कड़वाहटों की जड़ सिर्फ मनुष्य का दबा हुआ क्रोध ही है।
जो कर्म आपको सुख देता है, जो करने को मन भी मचलता है...वह ‘पाप’ कैसे हो सकता है? मृत्यु पश्चात् तो यूं भी आप कुछ नहीं कर पाने वाले।
पाप-पुण्य, मान-अपमान, अच्छा-बुरा, सफलता-असफलता यह सब बुद्धि के किये विभाजन हैं। मन के तल पर तो यह सिवाय व्यर्थ के उपद्रवों के और कुछ नहीं।
पाप-पुण्य, मान-अपमान, अच्छा-बुरा, सफलता-असफलता यह सब बुद्धि के किये विभाजन हैं। मन के तल पर तो यह सिवाय व्यर्थ के उपद्रवों के और कुछ नहीं।
‘‘क्रोध’’ व ‘‘प्रेम’’...मनुष्य जीवन में ऊर्जा के यही दो केन्द्र हैं। धर्म, शिक्षा व समाज ने मिलकर इन दोनों को ही मनुष्य में से खत्म कर दिया है। इसी से पूरी मनुष्य जाति मर-मरकर जीने को मजबूर है।
‘‘क्रोध’’ व ‘‘प्रेम’’...मनुष्य जीवन में ऊर्जा के यही दो केन्द्र हैं। धर्म, शिक्षा व समाज ने मिलकर इन दोनों को ही मनुष्य में से खत्म कर दिया है। इसी से पूरी मनुष्य जाति मर-मरकर जीने को मजबूर है।
‘‘क्रोध’’ व ‘‘प्रेम’’...मनुष्य जीवन में ऊर्जा के यही दो केन्द्र हैं। धर्म, शिक्षा व समाज ने मिलकर इन दोनों को ही मनुष्य में से खत्म कर दिया है। इसी से पूरी मनुष्य जाति मर-मरकर जीने को मजबूर है।