कोई भी शारीरिक प्रतिबंध दो-कौड़ी का है। महत्वपूर्ण वह प्रज्ञा है जिससे आपका मन परिवर्तित हो जाए।
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कोई भी शारीरिक प्रतिबंध दो-कौड़ी का है। महत्वपूर्ण वह प्रज्ञा है जिससे आपका मन परिवर्तित हो जाए।
‘आनंद’ सिर्फ उन कर्मों से उत्पन्न होता है, जिनका फल हाथोंहाथ मिलता है। ‘कर्म’ आज व ‘फल’ कल, ऐसे कर्मो से केवल सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं।
परम स्वतंत्रता का अर्थ है ‘‘स्व-अनुशासन’’ से खुलकर जीना। अहंकार का अर्थ है धर्म, समाज व अच्छे-बुरे के हजारों उधार लिये अनुशासन से जीना।
बुद्धि तोड़कर देखती है, क्योंकि उसे सिर्फ वस्तुओं की पहचान है। जबकि मन वस्तुओं को अलग से जानता ही नहीं; वह तरंगों व उनकी गहराइयों को ही समझता है। बस इन दोनों में आपसी Communication न बिठा पाने के कारण ही सभी पूरी तरह असफल हैं।
बुद्धि तोड़कर देखती है, क्योंकि उसे सिर्फ वस्तुओं की पहचान है। जबकि मन वस्तुओं को अलग से जानता ही नहीं; वह तरंगों व उनकी गहराइयों को ही समझता है। बस इन दोनों में आपसी Communication न बिठा पाने के कारण ही सभी पूरी तरह असफल हैं।
आपके मन में छिपे दुःख, क्रोध, चिंताएं व Frustration वगैरह को सिर्फ ‘‘मन का विज्ञान’’ समझकर ही दूर किया जा सकता है।
यदि आपको अपने व्यक्तित्व पर पूरा भरोसा हो तो आप पर दूसरे के मान-अपमान का कोई असर नहीं होगा।
विश्व खराब हो गया है, ऐसा नहीं है। आप जैसे हैं, विश्व आपको वैसा ही नजर आता है। विश्व शुरू से ऐसा है; ना यहां पर धर्म-युग कभी आया है न पापी-युग। यहां का सबकुछ सदैव से सिर्फ मनुष्य की दृष्टि पर निर्भर रहा है।
एक सच्चा ‘प्रेमी’ वह है जिसमें उसकी प्रेमिका को प्रेमी ही नहीं, दोस्त, पिता, गुरु, भाई, पुत्र सब नजर आए।
आप ईश्वर भरोसे जीने से पूर्व यह तो देख लें कि उसे पक्षपात कर आपका कुछ हित करने की Authority है भी या नहीं?