न तो शान से रहने में कोई बुराई है और ना ही सादगी से रहने में कोई अच्छाई है; परन्तु जो है उससे विपरीत दीखने और दिखाने की कोशिश ही हमारा पाखंड है।
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न तो शान से रहने में कोई बुराई है और ना ही सादगी से रहने में कोई अच्छाई है; परन्तु जो है उससे विपरीत दीखने और दिखाने की कोशिश ही हमारा पाखंड है।
भारतीय, सुख-शांति खोजने हेतु जितना ध्यान, पैसा, समय व शक्ति ‘धर्म’ पर खर्चा किये हुए हैं, उतना ही सबकुछ यदि वे विज्ञान की Researches पर लगाना प्रारंभ कर दें तो भारत वाकई सुखी व समृद्ध हो जाए।
''Photocopy" के आविष्कार के बाबत विज्ञान वाकई भ्रमित है। दरअसल Photocopyका Concept हजारों वर्ष पुराना है। एक बुद्ध या शंकराचार्य हुए नहीं कि उनकी हजारों-लाखों Photocopy बाजार में घूमती नजर आयी नहीं।
दुनिया का ऐसा कोई सुख नहीं जिसे भोगने पर बराबरी का दुःख न झेलना पड़ता हो। सो, दुःख से बचना हो तो भोक्तापन का एहसास दफना दो। और यह तभी संभव है जब आप ‘‘कर्तापन’’ का गुमान पालना बंद कर दें।
जीवन के सारे दुःखों की जड़ चाह है। चाह नजर बाहर घुमाने से पैदा होती है। यानी जिसकी नजर सिर्फ अपने पर बनी हुई हो वह कभी दुःखी नहीं होता।
दुनिया के सारे दुःखों का मूल ‘‘मेरे’’ में छिपा हुआ है। यदि मेरा धन है तो खोने का दुःख, मेरा शरीर है तो उसकी बीमारी का दुःख। ...जबकि वास्तव में तो आपका अपने ‘‘होनेपन’’ के एहसास के अलावा और कुछ नहीं।
जो वस्तु एक समय पर एक स्थान में योग्य है, वही समय व स्थान बदलते ही अयोग्य हो जाती है। ऐसे में हम अच्छे व बुरे कर्मों की कौन-सी List बनाने में लगे हुए हैं।
यह पूरा विश्व एक सायकोलोजी है। और यहां की हर सजीव-निर्जीव वस्तु की भी अपनी एक सायकोलोजी है। उसे उसके उस दायरे से बाहर कोई नहीं ला सकता।
आप शाकाहारी हैं तो इसमें इतना तनने की क्या बात है? तनना ही हो तो मांसाहारियों के ईजाद किये हवाईजहाज, गाड़ियों, ए.सी. से लेकर बीमार पड़ने पर ब्लड-टेस्ट तक के उपयोग बंद करके दिखाओ।
यह प्रकृति अपने नियम से चलती है। यहां नाशवान वस्तु नाश पा ही जाती है। इसीलिये यहां वक्त के साथ रावण की लंका ही नहीं ‘‘कृष्ण’’ की द्वारका भी डूब ही जाती है।