भविष्य रहस्यमय है। भविष्य हमेशा अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। वह कभी भी किसी के भी नियंत्रण में नहीं रहा है। इसीलिये भविष्य का विचार करते ही मनुष्य का मन भय, चिंता और असुरक्षा के कंपन पकड़ लेता है।
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भविष्य रहस्यमय है। भविष्य हमेशा अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। वह कभी भी किसी के भी नियंत्रण में नहीं रहा है। इसीलिये भविष्य का विचार करते ही मनुष्य का मन भय, चिंता और असुरक्षा के कंपन पकड़ लेता है।
पूरा विश्व So-called Religious है...चन्द बुद्धिमानों को छोड़कर। फिर इतने क्रोध, दुःख, चिंता, जलन और नफरत कहां से आ रहे? ...क्योंकि इन सभी भावों पर विजय ही तो धार्मिकता है।
इस संसार में सच्चाई के साथ जीने का एक ही मार्ग है - ‘‘आप या तो अपने समेत सबको मृत समझें, या फिर आप अपने समेत सबको बराबरी का इन्सान समझें।’’
हमें धर्म में इतनी रुचि है कि पहले तो जो हमें जगाने आता है, हम उसी को सुला देते हैं। फिर उसी को भगवान बनाकर उसके आसपास ऐसा धर्म रच डालते हैं जिससे हमें हिंसा, ईर्ष्या, पक्षपात, झूठ, छल या दगाबाजी करने में तो कोई बाधा न पहुंचे; पर साथ ही दो-चार पाखंड कर हमें धार्मिक होने का गुमान भी बना रहे।
जीवन साठ वर्ष का है, यह मानकर हम पूरे जीवन को ‘‘एक’’ मानकर जीते हैं। इसी कारण भूतकाल की यादें व भविष्य का डर हमें सताता रहता है। जबकि वास्तव में जीवन खरबों क्षणों के जोड़ का नाम है। अतः हर क्षण-नया क्षण। और जब हर क्षण नया क्षण है...तो कौन-सा भूतकाल व किसका भविष्य?
हम धर्मगुरु हैं। हमारा काम क्या है, जो आप करते हैं उसे पाप बताना। ...यानी आपके द्वारा दी जाने वाली दान-दक्षिणा पर आश्रित होने के बावजूद आपको गालियां देना। हमारी यह कला भी चल जाती है... क्योंकि जगत में बुद्धिमानों की कोई कमी नहीं।
हम धर्मगुरुओं की सबसे बड़ी कारीगरी तो यह कि जो हमें मिटाने आये हमने उन्हीं को आपके सामने भगवान बनाकर पेश कर दिया। अब बताओ, हमारी दुकान बंद हो तो भी कैसे?
एक समझदार व्यक्ति के लिए सोचने वाली बात यह कि पिछले पांच हजार वर्षों के इतिहास में हुए करोड़ों संत, मौलविओं व पादरियों ने मिलकर जगत का कितना उद्धार किया? और उसके सामने पांच-सौ वैज्ञानिकों ने जगत को क्या दिया? ...हमें सिर्फ यह तय करना है कि मनुष्य के प्रति वास्तविक करुणा से कौन भरा है?
कुछ पाने पर अहंकार पकड़ना सिर्फ इस बात का सबूत है कि आपको अपनी योग्यता से ज्यादा मिल गया है।
हमारे जीवन व व्यवसाय के सिद्धांतों में कोई फर्क नहीं। दोनों सबके हित की सोचने से ही फलते-फूलते हैं। स्वार्थी प्रवृत्ति से दोनों विनाश के कगार पर आ खड़े होते हैं।