कोटेशन्स
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सफल मनुष्य-जीवन जीने के लिए मनुष्य के स्वभाव में...एक कलाकार हृदय, वैज्ञानिक दृष्टि, व्यावसायिक बुद्धि, आत्मनिर्भरता का गुमान, आनंद लेने की कला, जीवन संबंधित सारे शौक व अंतःमस्ती; इन सातों स्वभाव का यथायोग्य मिश्रण होना आवश्यक है।

-दीप त्रिवेदी

जीवन में जो भी प्रयत्न कर पाया जाएगा वह कभी भी सुख नहीं देगा। क्योंकि दुःख की शुरुआत तो प्रयत्न करने से ही शुरू हो जाती है। जबकि जो कार्य आपसे आनंदपूर्वक होते हैं व होते चले जाते हैं, उससे आप जो भी हासिल करेंगे वे हमेशा ही परिणामकारी व सुखदायी होंगे।

-दीप त्रिवेदी

नास्तिक और आस्तिक में फर्क क्या है? नास्तिक वह है जो प्रकृति की महासत्ता को पहचानता नहीं; अतः स्वयं की बुद्धि से अर्जित ज्ञान के भरोसे जीवन संवारने में लगा हुआ है। आस्तिक वह है जो बुद्धि लगाता ही नहीं। वह स्वयं को उसके अर्पित कर देता है, प्रकृति उसे जैसा व जो बनाना चाहे बना ले।

-दीप त्रिवेदी

आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।

-दीप त्रिवेदी

हमारे जीवन व व्यवसाय के सिद्धांतों में कोई फर्क नहीं। दोनों सबके हित की सोचने से ही फलते-फूलते हैं। स्वार्थी प्रवृत्ति से दोनों विनाश के कगार पर आ खड़े होते हैं।

-दीप त्रिवेदी

जीवन के हर क्षेत्र में सम्पूर्ण आत्मनिर्भर होना आपका प्रथम कर्तव्य है। यदि आप किसी भी चीज के लिए किसी पर भी बोझ हैं...तो आपका जीवन व्यर्थ गया।

-दीप त्रिवेदी

छोटा समुदाय कट्टरता दिखाता है तो समझ में आता है। उनकी Insecurity व Inferiority समझी जा सके, वैसी होती है। पर इतना बड़ा मुस्लिम समुदाय खुले विचारों के साथ खड़ा न होकर अपना नुकसान स्वयं कर रहा है।

-दीप त्रिवेदी

असफल मनुष्य धर्म के पाखंड को अपनाता है। यह पाखंड झूठी आशाएं पैदा करता है। झूठी आशाएं खोटे कर्म करवाती हैं। गलत कर्म से ज्यादा दुःख उत्पन्न होता है। ज्यादा दुःख के कारण मनुष्य ज्यादा धर्म के पाखंड अपनाने लगता है। मनुष्य की इतनी असफलता सिर्फ इस कुचक्र में फंसे होने को आभारी है।

-दीप त्रिवेदी

नास्तिक और आस्तिक में फर्क क्या है? नास्तिक वह है जो प्रकृति की महासत्ता को पहचानता नहीं; अतः स्वयं की बुद्धि से अर्जित ज्ञान के भरोसे जीवन संवारने में लगा हुआ है। आस्तिक वह है जो बुद्धि लगाता ही नहीं। वह स्वयं को उसके अर्पित कर देता है, प्रकृति उसे जैसा व जो बनाना चाहे बना ले।

-दीप त्रिवेदी

यदि आप ‘‘अपने’’ किसी कार्य या विचारों से असंतुष्ट हैं तो भी उन्हें बदलने की कोशिश मत करना, आप असफल हो जाएंगे। आप अपना स्वभाव बदल दो; कार्य व विचार स्वतः ही बदल जाएंगे।

-दीप त्रिवेदी

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