कोटेशन्स
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ज्ञान के बड़े-बड़े दावे करने वाला यह मनुष्य दूसरों के बाबत या दूसरे विषयों पर अपनी हजार रायें ऐसे जाहिर करता है मानो उससे बड़ा ज्ञानी कोई हो ही नहीं; लेकिन ‘नींद’, जिसमें वह जीवन का एक-तिहाई हिस्सा गुजारता है, उस बाबत उसे कुछ नहीं मालूम... क्या यह हास्यास्पद नहीं लगता?

-दीप त्रिवेदी

सवाल यह कि कृष्ण, जीसस व बुद्ध जैसे अद्भुत व्यक्तित्व से ‘‘बुुद्धिमान’’ दूर क्यों हो गये? क्योंकि अपनी-अपनी दुकानें मजबूत करने हेतु धर्मगुरुओं ने उनके साथ चमत्कार जोड़ दिये। अब बुद्धिमान मनुष्य चाहे जो स्वीकारे पर ‘चमत्कार’ कभी नहीं स्वीकार सकता।

-दीप त्रिवेदी

क्या विज्ञान कभी जीवन पैदा कर पाएगा? नहीं, सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि पैदा या नष्ट करने की सत्ता यहां किसी के पास नहीं।

-दीप त्रिवेदी

कोई भी मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो, या फिर वह कितनी ही करुणा से क्यों न भरा हो; उसके लिये भी शरीर अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। हमारी ही तरह बीमार उनका शरीर भी पड़ता है; और जहर पिलाये जाने या सूली पर लटकाये जाने पर मृत्यु उनकी भी होती ही है। फिर भी उन्हें चमत्कारों से जोड़ना उनके व्यक्तित्व से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है?

-दीप त्रिवेदी

बुद्ध, कृष्ण, जीसस या मोहम्मद की करुणा में कोई कमी नहीं। वे कर सकते होते तो मनुष्य के ‘‘दुःख-दर्द’’ कब के दूर कर चुके होते। लेकिन दिक्कत यह कि इस हेतु हमें अपनी सहायता स्वयं करनी होती है।

-दीप त्रिवेदी

सफल मनुष्य-जीवन जीने के लिए मनुष्य के स्वभाव में...एक कलाकार हृदय, वैज्ञानिक दृष्टि, व्यावसायिक बुद्धि, आत्मनिर्भरता का गुमान, आनंद लेने की कला, जीवन संबंधित सारे शौक व अंतःमस्ती; इन सातों स्वभाव का यथायोग्य मिश्रण होना आवश्यक है।

-दीप त्रिवेदी

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

-दीप त्रिवेदी

आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य को अपने जीवन में "Third Force" की उपस्थिति का कई बार एहसास होता भी है, परंतु वह उसे ईश्वर व भाग्य से जोड़ने के कारण पहचानने में मात खा जाता है।

-दीप त्रिवेदी

यदि हमेशा आनंद में रहना चाहते हो तो जीवन के संघर्षों से भी एक खेल मानकर उलझो। देखें; संघर्ष हमसे जीतता है या हम संघर्ष से?

-दीप त्रिवेदी

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