जीते-जी मां-बाप का ध्यान क्यों नहीं रख लेते, जो मृत्यु पश्चात् ‘गिल्टी-वश’ उनका श्राद्ध करना प़ड़ता है।
-दीप त्रिवेदी
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जीते-जी मां-बाप का ध्यान क्यों नहीं रख लेते, जो मृत्यु पश्चात् ‘गिल्टी-वश’ उनका श्राद्ध करना प़ड़ता है।
-दीप त्रिवेदी
आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।
-दीप त्रिवेदी
हिंदू धर्म जहां के सारे भगवान ‘‘राजा’’ यानी सबको पालने वाले हैं, वह धर्म कैसे दूसरों से मांगकर अपना आश्रम बनाने वाले को धार्मिक मान ले?
-दीप त्रिवेदी
यह ‘‘संसार’’ क्रमशः प्रगति के सिद्धांत से फैल रहा है। यह विस्तार ना सिर्फ इसके Time व Space में जारी है, बल्कि चेतना के स्तर पर भी जारी ही है। उसने भी अमीबा से मनुष्य तक का सफर क्रमशः ही तय किया है।
-दीप त्रिवेदी
चाहे जितना ही बुरा आपके साथ घट गया हो पर उसे स्वीकारने के अलावा आपके पास उपाय ही क्या है? ...कुछ अन्य उपाय हो तो मुझे भी बताना।
-दीप त्रिवेदी
यदि आप अपनी निगाह लगातार करनेवाले यानी ‘अहंकार’ की जगह, देखनेवाले यानी ‘द्रष्टा’ पर बनाये रखेंगे...तो आपका वस्तुओं, व्यक्तियों व कर्मों से तादात्म्य टूट जाएगा। संसार के सारे दुःखों का मूल इस तादात्म्य में ही छिपा हुआ है।
-दीप त्रिवेदी
जैसे आप दूसरों की गलतियों का उसे भुगतते देख उस पर हंस लेते हैं, वैसे ही आप क्यों नहीं अपनी मूर्खताओं का अपने को भुगतते देख हंसते? यह सीख गये तो सारे गम ‘छू’।
-दीप त्रिवेदी
आनंद की परिभाषा क्या है? जब आप अपने स्वभाव के अनुरूप बरत रहे होते हैं तब उससे जो उत्पन्न होता है; उसका नाम ‘‘आंनद’’ है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘जागृत-व्यक्ति’’ वो है, जिसकी उपस्थिति में उसके आसपास के मनुष्य ही नहीं, घटनायें व कुदरत भी वही करने को मजबूर हो जाए जो वह चाहता है। ...ऐसा जागृत हो जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं।
-दीप त्रिवेदी
ना तो धर्म के नाम पर जागीर बनाने वाले और ना ही धर्म के नाम पर जागीर छोड़ने वाले ‘मोह-रहित’ कहे जा सकते हैं।
-दीप त्रिवेदी