न तो शान से रहने में कोई बुराई है और ना ही सादगी से रहने में कोई अच्छाई है; परन्तु जो है उससे विपरीत दीखने और दिखाने की कोशिश ही हमारा पाखंड है।
-दीप त्रिवेदी
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न तो शान से रहने में कोई बुराई है और ना ही सादगी से रहने में कोई अच्छाई है; परन्तु जो है उससे विपरीत दीखने और दिखाने की कोशिश ही हमारा पाखंड है।
-दीप त्रिवेदी
एक सच्चा आस्तिक, नास्तिक-सा भासता है; क्योंकि वह आपके धार्मिक पाखंडों व आपके धर्म के दलालों पर हमले बोलता है। वह भी क्या करे, उसका ईश्वर से Direct Contact जो हो जाता है।
-दीप त्रिवेदी
इस ब्रह्मांड में जीवन की कहीं कोई कमी नहीं। कुछ हमारे जैसे तो कई हमसे भिन्न मौजूद हैं। इसे जानने में बाधा ब्रह्मांड की Infinity के साथ-साथ जीवन के विकास की सीमा के कारण भी है।
-दीप त्रिवेदी
जीवन सिर्फ वर्तमान है। और उस वर्तमान में न तो भूतकाल की यादें समा सकती है, न भविष्य की चिंताएं। जीवन के सारे दुःखों की जड़ ही इस वर्तमान में भूतकाल या भविष्य को समाने की चेष्टा करने के कारण है।
-दीप त्रिवेदी
बुद्धिमान मनुष्य वह है जो जीवन में आवश्यक और व्यर्थ वस्तुओं को अलग-अलग पहचानता है।
-दीप त्रिवेदी
धार्मिक शास्त्र हजारों वर्ष पुराने हैं। वे जाने कबसे मनुष्य के उद्धार में लगे पड़े हैं। फिर भी मनुष्य के दुःख-दर्दों को देखते हुए वे पूरी तरह असफल सिद्ध हुए हैं। अब समय आ गया है...जब नये विचारों को अपनाया जाए।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य जन्म लिया है तो मन के हजारों शौक पालना व पूरे करना अच्छी बात है। यह आपके मन का विकास ही करेगा। परंतु चैतन्य के स्तर पर ‘ध्येय’ बड़ा व एक ही रखना। बुद्ध, जीसस, एडीसन, बिल गेट्स, शेक्सपीयर...सब चैतन्य के स्तर पर ‘एक-लक्षी’ होने के परिणाम हैं।
-दीप त्रिवेदी
क्या आप ‘करने’ और ‘होने’ का फर्क जानते हैं? आपको जीवन में जितना करना पड़ रहा है वह आपकी अशक्ति व गुलामी को दर्शाता है, व जितना आप से ‘‘हो रहा है’’ कायदे से तो बस उतना ही आप जी रहे हैं।
-दीप त्रिवेदी
समझ नहीं आता कि यह जैन मुनि अच्छे खाने, अच्छे कपड़े पहनने से लेकर अच्छे से नहाने व खुशबूदार रहने को भी कैसे पाप कहते हैं? फिर तो उनके अनुसार सारे जानवर वैसे ही ‘‘पक्के जैन’’ हो गये।
-दीप त्रिवेदी
‘‘मनुष्य’’ जानवरों और पेड़-पौधों से ज्यादा संवेदनशीलता की संभावना लेकर पैदा होता है, परन्तु दुर्भाग्य से वह उसका उपयोग नहीं कर पाता है। क्योंकि वह प्रकृति के साथ जीने के बजाय अपनी बुद्धि से जीने की कोशिश में लगा हुआ है।
-दीप त्रिवेदी