आप मेरा विश्वास करें कि ‘आप’ अपने समेत सबके जीवन के उतार-चढ़ावों को सिर्फ देखने वाले हैं। आपकी दिक्कत यह है कि आप अपने को करने वाला मानते हैं।
-दीप त्रिवेदी
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आप मेरा विश्वास करें कि ‘आप’ अपने समेत सबके जीवन के उतार-चढ़ावों को सिर्फ देखने वाले हैं। आपकी दिक्कत यह है कि आप अपने को करने वाला मानते हैं।
-दीप त्रिवेदी
जब पूरा विश्व ही धन की दौड़ में भाग रहा है तो मनुष्य शरीर की रक्षा करने वाले Doctors कैसे पीछे रह जाएं? हमारे सारे Blood Testकी Border Lines ही ऐसी बनायी गयी है कि एक नहीं तो दूसरी बढ़-घट किसी-न-किसी चीज में आ ही जाए, ताकि उनकी दवाइयां बिकती रहें।
-दीप त्रिवेदी
पूरा विश्व So-called Religious है...चन्द बुद्धिमानों को छोड़कर। फिर इतने क्रोध, दुःख, चिंता, जलन और नफरत कहां से आ रहे? ...क्योंकि इन सभी भावों पर विजय ही तो धार्मिकता है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘वक्त’’ वह धार है जो ‘‘कृष्ण’’ जैसे सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व को भी मौत की नींद सुला देता है। लेकिन उनका जीया जीवन व उनकी कही भगवद्गीता उन्हें अमर बना देती है। मरना आपको भी है, फिर कुछ ऐसा कर के क्यों नहीं मरते कि मर के भी न मरो।
-दीप त्रिवेदी
हिंदू धर्म की बुनियाद सहिष्णुता पर रखी हुई है। उसने बुद्ध, कबीर, शंकराचार्य, चाणक्य, दयानंद सरस्वती जैसे उनके वर्तमान पाखंड का विरोध करने वाले सभी का सम्मान किया। ना कि जीसस, सुकरात या मन्सूर जैसे सुधारकों को मारा। फिर यह हिंदू कट्टरता कहां से आयी? ...शायद यह अपनी दुकानें बचाने हेतु हिंदू धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी जा रही है।
-दीप त्रिवेदी
आपका ध्यान अपने को छोड़ सब पर लगा रहता है। इस बात का सबसे बड़ा सबूत यह कि सपनों में आपमें से किसी ने शायद ही कभी अपनी शक्ल देखी होगी। यह कितने दुःख की बात है कि ना सिर्फ Conscious Mind बल्कि Unconscious Mind में भी आपका ध्यान दूसरों पर ही रहता है।
-दीप त्रिवेदी
The concept of "God" भय के कारण अस्तित्व में आया है। ‘भय’ असुरक्षा व चाह से पैदा हुआ है। ...मजा यह कि इन दोनों की मृत्यु के बाद कोई जरूरत नहीं।
-दीप त्रिवेदी
ध्यान कोई अलग से लगाने या जंगल में जाकर पाने की वस्तु नहीं, हर छोटे-से-छोटा कार्य ध्यान से करने की आदत से ध्यान अपनेआप स्वतः ही बढ़ता चला जाता है।
-दीप त्रिवेदी
हमारे सारे दुःखों की जड़ में हमारा परिस्थिति के लिये मानसिक तौर पर तैयार न होना है। समझ नहीं आता कि जो दूसरों के साथ घटता है वह आपके साथ भी घट ही सकता है, यह आप मानकर ही क्यों नहीं चलते?
-दीप त्रिवेदी
जीवन में मानसिक तौर पर पागल होने से बचना चाहते हो तो अपने प्रेम व क्रोध को खुला छोड़ दो। ...यह दोनों दबाने से विकृत हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी