सफल जीवन वह है, जिसके मन में मृत्यु के समय कोई ‘चाह’ नहीं रह जाती।
-दीप त्रिवेदी
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सफल जीवन वह है, जिसके मन में मृत्यु के समय कोई ‘चाह’ नहीं रह जाती।
-दीप त्रिवेदी
जीवन को गौर से देखने पर पाओगे कि यहां के हर सुख के साथ दुःख... व हर दुःख के साथ सुख जुड़ा ही हुआ है। अतः जो कुछ भी घट रहा है उसमें अपनी निगाह सिर्फ सुख पर बनाये रखने से ही आप सदैव सुखी हो सकते हैं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य-जीवन का आनंद सिर्फ खुलकर जीने वाला ले सकता है। अहंकारी कभी खुल कर नहीं जी सकता। और हकीकत यह भी है कि हजार बंधनों से जीने वाला सिवाय मर-मरकर जीने के और कुछ कर भी नहीं सकता है।
-दीप त्रिवेदी
कितनी ही बड़ी समस्या से आप क्यों न घिरे हों, पर उसे सुलझाने हेतु ‘चिंतन’ व ‘चिंता’ का फर्क मालूम होना आवश्यक है। उसका चिंतन करने से समस्या कितनी ही जटिल क्यों न हो, वह जल्द ही सुलझ जाती है; जबकि समस्या की चिंता करने से समस्या आपको खा जाती है।
-दीप त्रिवेदी
जीवन में कोई भी वस्तु सिर्फ अच्छी या सिर्फ बुरी नहीं हो सकती। सूर्य जीवन देता है तो कड़ी धूप भी देता है। पानी प्यास बुझाता है तो बाढ़ लाकर तबाही भी मचाता है। अतः वस्तुओं की अच्छाई पकड़कर अपनाने वाला सुखी होता चला जाता है।
-दीप त्रिवेदी
सफल व्यक्ति चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, वह सायकोलोजी का मास्टर होता है। सफलता का सार-सूत्र ही यह है कि वह अपनी बातों व कार्यों से दूसरों को प्रभावित कर पा रहा है।
-दीप त्रिवेदी
‘हां’ आस्तिकता है और ‘ना’ नास्तिकता है। आपने जीवन में जितनी चीजों का दृढ़तापूर्वक निषेध कर रखा है...उतने ही आप अधार्मिक। अधार्मिकता का अर्थ ही ईश्वर की रचनाओं का अस्वीकार है।
-दीप त्रिवेदी
जो भी ऐतिहासिक मनुष्य हुए हैं, वे वो हैं जिन्होंने कुछ नया किया है। फिर नया उन्होंने चाहे विज्ञान, धर्म, व्यवसाय, संगीत, साहित्य या फिर Movie-making में ही क्यों नहीं किया हो? सोचना यह है कि ‘धर्म व शिक्षा’ के नाम पर हम जो ग्रहण कर रहे हैं, उसमें कुछ नया है भी या ऐसे ही ग्रहण किये चले जा रहे हैं?
-दीप त्रिवेदी
जो कर्म आपको सुख देता है, जो करने को मन भी मचलता है...वह ‘पाप’ कैसे हो सकता है? मृत्यु पश्चात् तो यूं भी आप कुछ नहीं कर पाने वाले।
-दीप त्रिवेदी
जीवन साठ वर्ष का है, यह मानकर हम पूरे जीवन को ‘‘एक’’ मानकर जीते हैं। इसी कारण भूतकाल की यादें व भविष्य का डर हमें सताता रहता है। जबकि वास्तव में जीवन खरबों क्षणों के जोड़ का नाम है। अतः हर क्षण-नया क्षण। और जब हर क्षण नया क्षण है...तो कौन-सा भूतकाल व किसका भविष्य?
-दीप त्रिवेदी