यदि आप कोई बड़ा कर्म डूबकर व बिना किसी आकांक्षा के कर सकें, तो मेरा विश्वास कीजिए कि उस एक कर्म से ही आप ‘‘ऐतिहासिक पुरुष’’ हो जाएंगे।
-दीप त्रिवेदी
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यदि आप कोई बड़ा कर्म डूबकर व बिना किसी आकांक्षा के कर सकें, तो मेरा विश्वास कीजिए कि उस एक कर्म से ही आप ‘‘ऐतिहासिक पुरुष’’ हो जाएंगे।
-दीप त्रिवेदी
हिंदू धर्म की बुनियाद सहिष्णुता पर रखी हुई है। उसने बुद्ध, कबीर, शंकराचार्य, चाणक्य, दयानंद सरस्वती जैसे उनके वर्तमान पाखंड का विरोध करने वाले सभी का सम्मान किया। ना कि जीसस, सुकरात या मन्सूर जैसे सुधारकों को मारा। फिर यह हिंदू कट्टरता कहां से आयी? ...शायद यह अपनी दुकानें बचाने हेतु हिंदू धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी जा रही है।
-दीप त्रिवेदी
आप कैसे हैं, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि ‘‘आप जैसे हैं वैसे दिखते हैं या नहीं।’’
-दीप त्रिवेदी
बुरा वह नहीं है जो अपना बुरा करने में लगा हुआ है। बुरा वह है जिससे दूसरों का बुरा हो रहा है। ...अपने पूरता तो मनुष्य हमेशा से स्वतंत्र है।
-दीप त्रिवेदी
विश्व इतिहास के एकमात्र सम्पूर्ण व्यक्तित्व के मालिक ‘‘कृष्ण’’ को भी जैन शास्त्रों ने नरक में जगह दी है। यहां तक कि पूरा विश्व जिनके तेज से प्रकाशमान है वैसे बुद्ध को भी जैन मुनि ‘‘महावीर’’ से दीक्षित बताते हैं। क्या यह उनकी Insecurity व Inferiority की Height नहीं?
-दीप त्रिवेदी
प्रकृति व प्राकृतिक वस्तुओं से छेड़छाड़ हमेशा महंगी पड़ती है। हम भी अपने स्वभाव में की जाने वाली छेड़छाड़ का ही भुगत रहे हैं।
-दीप त्रिवेदी
समृद्धि के लिए लक्ष्मीपूजन कर लक्ष्मी को परेशान सिर्फ भारत में किया जाता है। ...लगता है इस परेशानी के कारण ही लक्ष्मी भारत से रूठ गयी है। क्या ही अच्छा हो यदि समृद्धि के लिये हम अपने ‘‘कर्मों’’ पर ही आस्था बढ़ाएं।
-दीप त्रिवेदी
यदि आप अपने ‘होनेपन’ व ‘स्वभाव’ को अलग-अलग पहचान लेंगे, तो उसके बाद आपके जीवन में कभी कोई समस्या नहीं आएगी।
-दीप त्रिवेदी
वक्त ने ऐसी करवट ली कि संतों और व्यवसायियों की परिभाषा ही परिवर्तित हो गयी। पाखंड के नाम पर लाखों को लूटने वाले व्यवसायी आजकल ‘संत’ बने बैठे हैं। जबकि वास्तविक संत तो वे हैं जो अपनी कर्मठता से व्यवसाय फैलाकर लाखों को रोजगार दिये हुए हैं।
-दीप त्रिवेदी
आपके पास अपना धर्म है व अपने ईश्वर हैं। आपका अपना एक देश व समाज है। आप शिक्षित भी हैं व मन में हजारों महत्वाकांक्षा लिये जी भी रहे हैं। परिवार व मित्रों के नाम पर आपके अपने हजारों हितैषी भी हैं। समझ नहीं आता फिर जीवन में इतनी असफलता व दुःख क्यों है? कहीं आप कुदरत के परम नियम अकेले आने व अकेले जाने को तोड़ने का अन्जाम तो नहीं भोग रहे?
-दीप त्रिवेदी