कोटेशन्स
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बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध क्यों है? क्योंकि वह व्यक्तित्व-हीनता के कारण भीड़ में अकेले खड़े होने से घबराता है। ...जबकि ‘‘हिंदू’’ बने रहने पर उसे संबल बना रहता है कि उसके साथ सौ-करोड़ लोग हैं। यही सायकोलॉजी मुस्लिम, ईसाई व बौद्धों की भी है।

-दीप त्रिवेदी

आप अपनी कमजोर ‘‘दूरदृष्टि’’ पर गौर तो करें; जिन चीजों को प्राप्त करने हेतु आप इतना उत्साह दिखाते हैं, चन्द दिनों में ही वह आपको कांटों की तरह चुभना प्रारंभ कर देती है।

-दीप त्रिवेदी

आप अपने को Conscious Mind से जानते हैं, जबकि आपकी बुराइयों की सारी जड़ें आपके Subconsciousव Unconscious Mind में छिपी पड़ी हैं। अतः Subconscious d Unconscious Mind को जाने बगैर आप जीवन में सफलता की ओर एक कदम नहीं बढ़ा सकते।

-दीप त्रिवेदी

किसी भी प्रकार का Creation करना व कर पाना ईश्वर के निकट होने का सबूत है।

-दीप त्रिवेदी

यह नहीं है कि मुस्लिम समुदाय परिवर्तित नहीं हो रहा है, पर उसकी गति अत्यंत धीमी है। वे समझते क्यों नहीं कि विश्व के साथ कदम-से-कदम मिलाए बगैर कोई प्रगति की राह पर आगे नहीं बढ़ सकता।

-दीप त्रिवेदी

‘‘मनुष्य’’ जानवरों और पेड़-पौधों से ज्यादा संवेदनशीलता की संभावना लेकर पैदा होता है, परन्तु दुर्भाग्य से वह उसका उपयोग नहीं कर पाता है। क्योंकि वह प्रकृति के साथ जीने के बजाय अपनी बुद्धि से जीने की कोशिश में लगा हुआ है।

-दीप त्रिवेदी

कई लोग शुभ-मुहूर्त के चक्कर में समय-संजोग व परिस्थिति बन जाने के बावजूद ‘‘कर्म’’ को टालते हैं, वहीं अन्य कई संजोग न बनने के बावजूद इस चक्कर में कर्म कर डालते हैं। यह सब अपनी मौत मरने के ‘‘गालीबे-Idea’’ अच्छे हैं।

-दीप त्रिवेदी

बुद्ध, कृष्ण, जीसस या मोहम्मद की करुणा में कोई कमी नहीं। वे कर सकते होते तो मनुष्य के ‘‘दुःख-दर्द’’ कब के दूर कर चुके होते। लेकिन दिक्कत यह कि इस हेतु हमें अपनी सहायता स्वयं करनी होती है।

-दीप त्रिवेदी

आपके पास अपना धर्म है व अपने ईश्वर हैं। आपका अपना एक देश व समाज है। आप शिक्षित भी हैं व मन में हजारों महत्वाकांक्षा लिये जी भी रहे हैं। परिवार व मित्रों के नाम पर आपके अपने हजारों हितैषी भी हैं। समझ नहीं आता फिर जीवन में इतनी असफलता व दुःख क्यों है? कहीं आप कुदरत के परम नियम अकेले आने व अकेले जाने को तोड़ने का अन्जाम तो नहीं भोग रहे?

-दीप त्रिवेदी

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