जीवन साठ वर्ष का है, यह मानकर हम पूरे जीवन को ‘‘एक’’ मानकर जीते हैं। इसी कारण भूतकाल की यादें व भविष्य का डर हमें सताता रहता है। जबकि वास्तव में जीवन खरबों क्षणों के जोड़ का नाम है। अतः हर क्षण-नया क्षण। और जब हर क्षण नया क्षण है...तो कौन-सा भूतकाल व किसका भविष्य?
-दीप त्रिवेदी