हम ‘‘मनुष्य’’ के शरीर, संस्कृति व चेतना के जिस Refined स्वरूप को देख रहे हैं, वह अरबों वर्षों के करोड़ों असफल प्रयास के बाद प्राप्त हुआ है। ऐसे मूल्यवान जीवन को सिर्फ शिक्षा, शादी, बच्चे, कमाने व बुढ़ापे के रोने में नष्ट नहीं किया जा सकता।
-दीप त्रिवेदी