हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?
-दीप त्रिवेदी