पाप-पुण्य, मान-अपमान, अच्छा-बुरा, सफलता-असफलता यह सब बुद्धि के किये विभाजन हैं। मन के तल पर तो यह सिवाय व्यर्थ के उपद्रवों के और कुछ नहीं।
-दीप त्रिवेदी
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पाप-पुण्य, मान-अपमान, अच्छा-बुरा, सफलता-असफलता यह सब बुद्धि के किये विभाजन हैं। मन के तल पर तो यह सिवाय व्यर्थ के उपद्रवों के और कुछ नहीं।
-दीप त्रिवेदी
हमें न सूरज-चांद उगाने हैं, न गुरुत्वाकर्षण ही सम्भालना है। हमें तो अपने खाये भोजन का खून तक नहीं बनाना है। हमें तो सिर्फ अपने जीवन को आनंद, शांति व सफलता की राह पर लगाना है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि बुद्धिमानी का दावा करने वाले हमसे इतना तक नहीं होता?
-दीप त्रिवेदी
मंदिर-मस्जिद-चर्च न जाने वाले करोड़ों-करोड़ लोग इस विश्व में जी रहे हैं, और हकीकत यह है कि वे ज्यादा चैन व मजे से जी रहे हैं। लेकिन संसार का कोई भी व्यक्ति आज ‘‘विज्ञान’’ के उपयोग के बगैर नहीं जी रहा। जी के देख लें, ‘नर्क’ किसे कहते हैं...पता चल जाएगा।
-दीप त्रिवेदी
जिन्होंने भी जीवन में बड़ी सफलता पायी है, उन्होंने जाने-अनजाने दृढ़तापूर्वक मन की चार में से कोई एक राह पकड़ी ही हुई है; आनंद, स्वभाव, सहजता या स्वतंत्रता। और जो पकड़ी है...फिर उसका हरहाल में लगातार साथ दिया है।
-दीप त्रिवेदी
दुनिया के बुद्धिमानों को धर्म में इतनी अरुचि क्यों हो गयी? क्योंकि बुद्ध, जीसस व कृष्ण के नाम पर उनको इन महापुरुषों की बातों के बदले धर्मगुरुओं ने अपने द्वारा रचित बाइबल व वेद वगैरह उन तक पहुंचाए।
-दीप त्रिवेदी
जैसे Space Shuttles को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने हेतु एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है; वैसे ही मन को बुद्धि के प्रभाव से मुक्त करने हेतु हमें भी एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है।
-दीप त्रिवेदी
यदि आप अपनी निगाह लगातार करनेवाले यानी ‘अहंकार’ की जगह, देखनेवाले यानी ‘द्रष्टा’ पर बनाये रखेंगे...तो आपका वस्तुओं, व्यक्तियों व कर्मों से तादात्म्य टूट जाएगा। संसार के सारे दुःखों का मूल इस तादात्म्य में ही छिपा हुआ है।
-दीप त्रिवेदी
आपका ‘मन’ दरअसल तरंगों का जोड़ है। अतः यह कभी भी विज्ञान की पकड़ में नहीं आने वाला। और चूंकि आप अपने सारे सुख-दुःख भी मन के परदे पर ही झेलते हैं, इसलिए विज्ञान कभी भी आपके भीतर कितना दुःख छिपा है या वह कहां से आ रहा है; नहीं बता सकता। ना ही वह कभी Surgery कर उस दुःख को आपके शरीर से अलग कर पाएगा।
-दीप त्रिवेदी
प्रेम और क्रोध एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं। एक का ठीक तरीके से उपयोग करना सीख जाओ...दूसरे की ऊर्जा स्वतः ही परिणामकारी कर्मों में लग जाएगी।
-दीप त्रिवेदी
इस जगत में चाह से परिणाम आ जाते होते तो - तो किसी की चाह में कोई कमी नहीं।
-दीप त्रिवेदी