कोटेशन्स
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आपको हजार काम छोड़ आपके व परम-सत्ता के बीच संवाद स्थापित करना है। संवाद स्थापित होते ही आपके सारे भ्रम टूट जाएंगे। और जिसको कोई ‘‘भ्रम’’ ही न रहा उसे सफलता के शिखर छूने से कौन रोक सकता है?

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति व प्राकृतिक वस्तुओं से छेड़छाड़ हमेशा महंगी पड़ती है। हम भी अपने स्वभाव में की जाने वाली छेड़छाड़ का ही भुगत रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

समझ नहीं आता कि यह जैन मुनि अच्छे खाने, अच्छे कपड़े पहनने से लेकर अच्छे से नहाने व खुशबूदार रहने को भी कैसे पाप कहते हैं? फिर तो उनके अनुसार सारे जानवर वैसे ही ‘‘पक्के जैन’’ हो गये।

-दीप त्रिवेदी

जैसे विज्ञान को किसी वस्तु के रूपांतरण हेतु ‘‘ऊर्जा’’ की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही आपको अपना स्वभाव बदलने हेतु भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि आप में ऊर्जा नहीं तो चाहकर भी आप अपने में बदलाव नहीं ला सकते हैं।

-दीप त्रिवेदी

समय सिर्फ घाव देता है ऐसा नहीं है। समय बड़े-से-बड़े घाव भर भी देता है। सबूत के तौर पर कितना ही बड़ा सदमा क्यों न हो...समय के साथ मनुष्य सम्भल ही जाता है।

-दीप त्रिवेदी

क्या पुनर्जन्म होता है? अवश्य...। लेकिन प्रकृति के इस सिद्धांत पर कि यदि आप हैं ही नहीं तो ‘पैदा’ नहीं किये जा सकते; और आप हैं तो मिटाये नहीं जा सकते।

-दीप त्रिवेदी

जीवन अपने व दूसरों के उद्धार हेतु पुरजोर ‘‘कर्म’’ करने व जब मौका मिले...दिल खोलकर आनंद लेने का दूसरा नाम है। जीवन का और कोई मकसद होता ही नहीं है।

-दीप त्रिवेदी

आप कैसे हैं, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि ‘‘आप जैसे हैं वैसे दिखते हैं या नहीं।’’

-दीप त्रिवेदी

जो ‘है’ उसका आनंद लेना तो समझ में आता है; पर उसके बिछड़ने का मातम मनाना हमेशा से समझ के परे रहा है।

-दीप त्रिवेदी

जितना आप प्राकृतिक हो के जीते हैं उतनी ही आपको प्रकृति से ऊर्जा मिलती है। ध्यान रहे कि जीवन को सफल बनाने हेतु आपकी अपनी ऊर्जा बहुत कम पड़ती है।

-दीप त्रिवेदी

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