कोटेशन्स
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यदि आपको बुद्ध, जीसस, कृष्ण या किसी भी बड़े Philosophers की बात को समझना है तो, उनकी कही बातों में दो भेद करने का ज्ञान होना आवश्यक है। एक ‘सनातन-सत्य’ व दूसरा ‘समय का सत्य’। इन दोनों में भेद किये बगैर आप उनकी सारी बातों का उलटा अर्थ ही निकालेंगे।

-दीप त्रिवेदी

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

-दीप त्रिवेदी

यदि आप कोई बड़ा कर्म डूबकर व बिना किसी आकांक्षा के कर सकें, तो मेरा विश्वास कीजिए कि उस एक कर्म से ही आप ‘‘ऐतिहासिक पुरुष’’ हो जाएंगे।

-दीप त्रिवेदी

यदि जीवन में कुछ बड़ा कर दिखाने के अहंकार का अनुभव करना हो तो सुबह-शाम करने वाले छोटे-मोटे पचासों अहंकारों को छोड़ना पड़ेगा।

-दीप त्रिवेदी

‘‘न कुछ पाप है न कुछ पुण्य’’ यह तो स्वयं कृष्ण ने गीता में कई बार कहा। फिर ये संत क्यों रोज-रोज हमें पापों की फेहरिस्त पढ़ा-पढ़ाकर डरा रहे हैं?

-दीप त्रिवेदी

क्या आपको जीवन में प्रकृति के ‘‘अचानक’’ का कभी कोई एहसास नहीं हुआ? गौर करो, आप कुछ याद करने की कोशिश करते हैं - याद नहीं आता; फिर अचानक याद आ जाता है। आप कुछ पाने के हजार प्रयत्न करते हैं पर नहीं पा पाते; ...फिर एक दिन जब उस पाने को भूल भी चुके होते हैं कि अचानक पा लेते हैं।

-दीप त्रिवेदी

हमें फैसला यह करना है कि मंदिर-मस्जिद-चर्च जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मन के विकार दूर करना?

-दीप त्रिवेदी

हमारे मन की गहराइयां सूर्य की तरह सदैव प्रकाशमान है। हमने बुद्धि का साया डालकर उसपर ग्रहण लगा रखा है।

-दीप त्रिवेदी

हम पर आनेवाली अधिकांश मुसीबतों में हमारे करने लायक कुछ नहीं होता है। अक्सर वे दूसरों को परेशान करने आयी होती हैं, हम तो घबराकर उसमें अपनी टांग फंसाने के कारण उलझ जाते हैं।

-दीप त्रिवेदी

राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।

-दीप त्रिवेदी

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