हमारे मन व जीवन के सिद्धांत, विज्ञान के सिद्धांतों से कहीं गहरे व ऊंचे हैं। दरअसल विज्ञान की भी सारी खोजें तो मन व जीवन के सिद्धांतों को ही आभारी हैं।
-दीप त्रिवेदी
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हमारे मन व जीवन के सिद्धांत, विज्ञान के सिद्धांतों से कहीं गहरे व ऊंचे हैं। दरअसल विज्ञान की भी सारी खोजें तो मन व जीवन के सिद्धांतों को ही आभारी हैं।
-दीप त्रिवेदी
निश्चित ही आत्मतृप्ति से बड़ा सुख इस विश्व में कोई नहीं। ...पर आत्मतृप्ति का अनुभव आता ही दूसरों का भला करने से है।
-दीप त्रिवेदी
आपके पास क्या और कितना है यह आपके धनी होने का सबूत नहीं...पर हां, आप क्या व कितना और पाना चाहते हैं, यह आपकी दरिद्रता को अवश्य दर्शाता है।
-दीप त्रिवेदी
क्या कभी आपने शेर को शिकार करते सिखाने की, या बंदरों को उछलना सिखाने की; या फिर गाय को मांसाहार न खाने की सलाह देने वाली Classes देखी है? तो फिर हमें क्या व क्यों सिखाया जा रहा है? कहीं हमारे धर्मगुरु व शास्त्र हमें जानवरों से भी गये-बीते तो नहीं समझ रहे?
-दीप त्रिवेदी
Concentration एक जादू है, क्योंकि Concentration में ऊर्जा सरक्युलर घूमती है। दूसरी तरफ पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा भी सरक्युलर घूमती है। इसीलिये Concentration में हमारी प्रकृति से ट्युनिंग बैठ जाती है। और एक बार प्रकृति से Tuning बैठ गयी फिर जीवन सुख और समृद्धि से भरा ही समझो। अतः यदि बड़ी सफलता पानी हो तो हर छोटे-से छोटा कार्य ध्यान से करना सीखना ही होगा।
-दीप त्रिवेदी
इस ब्रह्मांड में सूर्य, पानी, हवा सब अपने कार्य में तो लगे हैं पर इनको आकांक्षा कोई नहीं। पाना कुछ नहीं। जब हम भी बिना किसी आकांक्षा के कार्यों में व्यस्त होना सीख जाएंगे, तो संतोष के परम-शिखर पर जा बैठेंगे।
-दीप त्रिवेदी
चूंकि मनुष्य की चेतना ने अमीबा से मनुष्य तक का सफर क्रमशः प्रगति के सिद्धांत पर आधारित होकर ही तय किया है, इसलिये ध्यान देना कि हर कोई अपने में कई जानवरों के गुण पाएगा। और उन गुणों से निजात पाना ही मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है।
-दीप त्रिवेदी
आप मेरा विश्वास करें कि ‘आप’ अपने समेत सबके जीवन के उतार-चढ़ावों को सिर्फ देखने वाले हैं। आपकी दिक्कत यह है कि आप अपने को करने वाला मानते हैं।
-दीप त्रिवेदी
राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।
-दीप त्रिवेदी
वक्त ने ऐसी करवट ली कि संतों और व्यवसायियों की परिभाषा ही परिवर्तित हो गयी। पाखंड के नाम पर लाखों को लूटने वाले व्यवसायी आजकल ‘संत’ बने बैठे हैं। जबकि वास्तविक संत तो वे हैं जो अपनी कर्मठता से व्यवसाय फैलाकर लाखों को रोजगार दिये हुए हैं।
-दीप त्रिवेदी