कोटेशन्स
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पहले तो हम सिर्फ मंदिर में जाकर कुछ चढ़ा आते थे। अब तो पंडितों की लालच इतनी बढ़ गयी है कि वे आश्वासनोंें के नाम पर अंगूठी, धागे व प्रतिष्ठान भी बेचकर गरीब जनता को लूटने में लग गए हैं।

-दीप त्रिवेदी

धर्म क्या है? मन व जीवन का विज्ञान। बुद्ध, कृष्ण, जीसस क्या हैं? हमारे मन व जीवन के Doctor।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य के मन की श्रेष्ठ स्थिति दो विरोधाभासों से ही संतुलित होती है। लेकिन हम बुद्धि के चक्कर में एक को अपनाने व दूसरे को छोड़ने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारा अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब इसी से परिभाषित है।

-दीप त्रिवेदी

किसी भी वस्तु को प्राप्त करने से पहले ही उस बाबत उत्साहित हो जाना हमेशा जरूरत से ज्यादा दुःखद परिणाम लेकर आता है। विश्वास करने हेतु ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं, अपने ही जीवन की चन्द घटनाओं पर नजर घुमा लें...समझ जाएंगे।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति में कोई भी मनुष्य परफेक्ट नहीं होता है। हर व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और अपना एक क्षेत्र होता है। हम जिन्हें भगवान कहते हैं वे भी जीवनभर विज्ञान के ज्ञान से अनजान ही थे।

-दीप त्रिवेदी

‘कर्म करो पर फल की चिंता मत करो’ यह विश्व के सबसे बड़े ज्ञानी ‘‘कृष्ण’’ ने विश्व के सबसे अनूठे ग्रंथ ‘‘भगवद्गीता’’ में कहा उनका सबसे अद्भुत श्लोक है। विडंबना यह कि हमारी सारी पूजाएं, यज्ञ, उपवास, वास्तु, ज्योतिष सब फल की आशा से निकले कर्म हैं।

-दीप त्रिवेदी

दुनिया में दो ही तरीके के लोग सुखी व सफल हो सकते हैं। एक तो वे जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मान ले...फिर तो अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब उसकी मरजी से हो रहा है, बात समाप्त हुई। या तो वे जो मान ले कि ईश्वर है ही नहीं और अपनी सम्पूर्ण जवाबदारी स्वयं उठा ले, बात फिर भी समाप्त हो गयी। लेकिन क्योंकि सभी इन दो पाटनों के बीच में झूला झूल रहे हैं, इसलिए दुःखी व असफल हैं।

-दीप त्रिवेदी

हम गलत शिक्षाओं के कारण जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, आत्मविश्वास, उत्साह, Concentration और दूरदृष्टि जैसे महत्त्वपूर्ण गुण खोते चले जाते हैं। वरना बच्चों के तो यह सब स्वाभाविक गुण होते हैं। ऐसे में क्या हमें अपनी शिक्षा-पद्धति पर दोबारा गौर करने की आवश्यकता नहीं?

-दीप त्रिवेदी

क्या आपने कभी गौर किया कि मन के भीतर से जो कुछ भी आ रहा है, उसे रोकने में ही हम अपनी सर्वाधिक शक्ति का नाश कर देते हैं?

-दीप त्रिवेदी

जो भी परिणामकारी ज्ञान है वह मनुष्य के भीतर मन की गहराइयों में ही छिपा पड़ा है। यही कारण है कि मोजार्ट की धुनें हो या उमर खय्याम की रुबाइयां, कृष्ण की भगवद्गीता हो या आईन्स्टाइन का दुनिया बदलकर रख देने वाला सिद्धांत E=mc2; सब भीतर से बाहर निकली चीजें ही हैं।

-दीप त्रिवेदी

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