बड़े कार्य ऊंची महत्वाकांक्षाओं के चलते नहीं, बल्कि उच्च कोटि के ध्यान व बड़े पैमाने की कटिबद्धता के सहारे निपटाये जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
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बड़े कार्य ऊंची महत्वाकांक्षाओं के चलते नहीं, बल्कि उच्च कोटि के ध्यान व बड़े पैमाने की कटिबद्धता के सहारे निपटाये जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
आप मन और जीवन समझना चाहते हैं, तो वह धर्म या विद्यालय नहीं सिखा पाएंगे। उस हेतु तो आपको अपने चारों तरफ घट रही प्राकृतिक घटनाओं को ध्यान से देखना पड़ेगा।
-दीप त्रिवेदी
आज पूरी मनुष्यजाति सिर्फ धन के आसरे व सहारे जी रही है। अब तो धन की इस अंधी दौड़ से धर्म, राजनीति व सामाजिक संस्थाएं भी पूरी तरह ओत-प्रोत हैं। ऐसे में आम-मनुष्य के पास धन बचे भी तो कैसे?
-दीप त्रिवेदी
‘‘भाग्य’’ सिवाय अपनी असफलता छिपाने के एक खूबसूरत बहाने से ज्यादा और कुछ नहीं।
-दीप त्रिवेदी
विज्ञान की कोई ऐसी खोज नहीं जिसे जैन मुनि अपने शास्त्रों में वर्णित न बताते हों। ज्ञान-विज्ञान से इतने परिपूर्ण शास्त्र होने के बावजूद विज्ञान तो छोड़ो, किसी भी क्षेत्र में एक भी जैन विश्व स्तर पर कुछ किया नहीं दिखता। लगता है अब उन्हें Nobel Prize के लिये अपने शास्त्र भिजवाने प्रारंभ कर देने चाहिए।
-दीप त्रिवेदी
हर कोई अपनी जाति व धर्म पर गुमान किये फिरता है। मेहरबानी कर एकबार स्वयं को व अपने आसपास वालों को ध्यान से देख लेना - गुमान स्वतः छू हो जाएगा। और तब कहीं जाकर आप विश्व को अपनाकर उन्नति के रास्ते पर लग सकेंगे।
-दीप त्रिवेदी
पूरा विश्व So-called Religious है...चन्द बुद्धिमानों को छोड़कर। फिर इतने क्रोध, दुःख, चिंता, जलन और नफरत कहां से आ रहे? ...क्योंकि इन सभी भावों पर विजय ही तो धार्मिकता है।
-दीप त्रिवेदी
बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य के शरीर बाबत Science के सारे तारण हमेशा 'Ifs and Buts' के सहारे ही रहेंगे। क्योंकि जीवन की अनिश्चितता ही ‘‘कुदरत की लीला’’ है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।
-दीप त्रिवेदी