कोटेशन्स
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दुनिया में दो ही तरीके के लोग सुखी व सफल हो सकते हैं। एक तो वे जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मान ले...फिर तो अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब उसकी मरजी से हो रहा है, बात समाप्त हुई। या तो वे जो मान ले कि ईश्वर है ही नहीं और अपनी सम्पूर्ण जवाबदारी स्वयं उठा ले, बात फिर भी समाप्त हो गयी। लेकिन क्योंकि सभी इन दो पाटनों के बीच में झूला झूल रहे हैं, इसलिए दुःखी व असफल हैं।

-दीप त्रिवेदी

आप प्रेम हो या व्यवसाय, दान हो या क्रोध, सबकुछ आधे-अधूरे मन से ही करते हैं। ऐसे में आप निर्णायक परिणाम की अपेक्षा ही कैसे रख सकते हैं?

-दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म ने नरमुंडों की माला पहनने वालों से लेकर सोमरस, भांग व नृत्य के शौकीनों को भी भगवान स्वीकारा। क्योंकि हिंदू धर्म वस्तुओं का निषेध नहीं, उन्हें ग्रहण करने के सलीके सिखाने में विश्वास करता है।

-दीप त्रिवेदी

हम हैं क्या...? हमारी तो देखने, सुनने व तापमान सहन करने तक की एक सीमा है। ...ऐसे में हमारी बुद्धि की समझ का अस्तित्व ही क्या, जो उसके भरोसे हम सफलता के शिखर छूने की उम्मीद लगाये बैठे हैं। जीवन सफल बनाना हो तो वह मन की गहराइयों को समझकर व उसमें डूबकर ही बनाया जा सकता है।

-दीप त्रिवेदी

कोई कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, चाहे उसकी आपके प्रति कैसी ही उच्च भावना क्यों न हो...या फिर उसे आप भगवान ही क्यों न मानते हों; उसे भी इतनी सत्ता नहीं कि वह आपके सुख-समृद्धि का कोई स्थायी उपाय कर सके।

-दीप त्रिवेदी

मैं आपके उन धर्म गुरुओं में से हूँ जिसने जैसे ही पाया कि मुझ में आगे बढ़ने के कोई गुण जैसे कला, विज्ञान, मेहनत करने की लगन या डिग्री कुछ भी नहीं; तो मैंने आश्वासनों व आशीर्वादों की दुकान खोल ली। ...और देखो आज मेरे पास एकड़ों में जमीन, अपना आश्रम व आप जैसे हजारों बुद्धिमान श्रद्धालु हैं।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं, यदि उसे समय के अनुरूप मन की गहराइयों से अपनाया जाए। इसीलिए हिंदू भगवानों व देवताओं ने यहां की हर रचना से प्यार किया। फिर यह हिंदू संन्यासी अपनी कमजोरियां छिपाने हेतु किन चीजों के तिरस्कार को धर्म कह रहे हैं?

-दीप त्रिवेदी

धर्म का कोई ताल्लुक ईश्वर, पूजा-पाठ, मंदिर-मस्जिद या चर्चों से नहीं है; धर्म का सीधा ताल्लुक तो सिर्फ मनुष्य के मन को नयी ऊंचाइयां प्रदान करने वाली शिक्षाओं से है।

-दीप त्रिवेदी

समझ नहीं आता कि यह जैन मुनि अच्छे खाने, अच्छे कपड़े पहनने से लेकर अच्छे से नहाने व खुशबूदार रहने को भी कैसे पाप कहते हैं? फिर तो उनके अनुसार सारे जानवर वैसे ही ‘‘पक्के जैन’’ हो गये।

-दीप त्रिवेदी

जीवन अपने व दूसरों के उद्धार हेतु पुरजोर ‘‘कर्म’’ करने व जब मौका मिले...दिल खोलकर आनंद लेने का दूसरा नाम है। जीवन का और कोई मकसद होता ही नहीं है।

-दीप त्रिवेदी

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