कोटेशन्स
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मन का विज्ञान हमारे बुद्धि के ज्ञान से सर्वथा उलटा है। मन के तल पर चूंकि हम गलत कार्य कर पछताते हैं, इसीलिए उसी कार्य को फिर-फिर दोहराते हैं। अतः मन के तल पर पछताना नहीं, समझना हितकर है।

-दीप त्रिवेदी

बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।

-दीप त्रिवेदी

ब्रह्मांड में हर वस्तु का अपना एक स्वभाव है। प्रकृति की किसी भी वस्तु को अपने स्वभाव के बारे में कोई कन्फ्यूजन कभी नहीं होता है। यह मनुष्य ही एक ऐसा बुद्धिमान है जिसे अपने स्वयं के स्वभाव के बारे में कुछ पता नहीं।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य जन्म लिया है तो मन के हजारों शौक पालना व पूरे करना अच्छी बात है। यह आपके मन का विकास ही करेगा। परंतु चैतन्य के स्तर पर ‘ध्येय’ बड़ा व एक ही रखना। बुद्ध, जीसस, एडीसन, बिल गेट्स, शेक्सपीयर...सब चैतन्य के स्तर पर ‘एक-लक्षी’ होने के परिणाम हैं।

-दीप त्रिवेदी

इस संसार में ‘जो’ हर घटनेवाली अच्छी-बुरी घटना से सीखने की कला जानता है, व पूरे सब्र के साथ घटनेवाली घटना के अंतिम परिणाम का इन्तजार कर सकता है; ‘वह’ जल्द ही जान जाता है कि यहां बुरा कुछ हो ही नहीं सकता।

-दीप त्रिवेदी

हिंदूओं ने भगवान ही उन्हें स्वीकारा जिन्होंने पापियों का नाश किया। हम भी क्यों न उन्हें सीधी राह पर ले आएं ‘‘जो’’ हमारे ही खून-पसीने की कमाई से स्वयं के आश्रम फैलाने में लगे हुए हैं। ...यदि आपने यह कमाल कर दिखाया तो आपके भारत को विश्व का ‘‘नंबर-वन’’ राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।

-दीप त्रिवेदी

एक सच्चा आस्तिक, नास्तिक-सा भासता है; क्योंकि वह आपके धार्मिक पाखंडों व आपके धर्म के दलालों पर हमले बोलता है। वह भी क्या करे, उसका ईश्वर से Direct Contact जो हो जाता है।

-दीप त्रिवेदी

चूंकि मनुष्य की चेतना ने अमीबा से मनुष्य तक का सफर क्रमशः प्रगति के सिद्धांत पर आधारित होकर ही तय किया है, इसलिये ध्यान देना कि हर कोई अपने में कई जानवरों के गुण पाएगा। और उन गुणों से निजात पाना ही मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है।

-दीप त्रिवेदी

Complex की जड़ तुलनात्मक शिक्षाओं के कारण मजबूत होती है । दो वस्तुओं या मनुष्यों की तुलना करने से ज्यादा मूर्खतापूर्ण कार्य इस संसार में दूसरा कोई नहीं।

-दीप त्रिवेदी

The concept of "God" भय के कारण अस्तित्व में आया है। ‘भय’ असुरक्षा व चाह से पैदा हुआ है। ...मजा यह कि इन दोनों की मृत्यु के बाद कोई जरूरत नहीं।

-दीप त्रिवेदी

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