कोटेशन्स
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क्या आपको जीवन में प्रकृति के ‘‘अचानक’’ का कभी कोई एहसास नहीं हुआ? गौर करो, आप कुछ याद करने की कोशिश करते हैं - याद नहीं आता; फिर अचानक याद आ जाता है। आप कुछ पाने के हजार प्रयत्न करते हैं पर नहीं पा पाते; ...फिर एक दिन जब उस पाने को भूल भी चुके होते हैं कि अचानक पा लेते हैं।

-दीप त्रिवेदी

विश्व के अन्य कणों की तरह ‘‘अहंकार’’ को भी मिटाया नहीं जा सकता है। हां, पर उसका आत्मिक गुणों में रूपांतरण अवश्य हो सकता है। ...पर जैसे ही कोई ‘‘बुद्ध’’ उसकी कोशिश करता है, मिटने के डर से अहंकार प्रतिकार को उतर आता है।

-दीप त्रिवेदी

मजा यह कि जिन देशों ने बुद्ध को अपनाया उन्होंने भी कुछ कम गजब नहीं किया। बुद्ध का भगवान में विश्वास नहीं था। वे हर तरह की पूजा के भी विरोधी थे। ...पर उन्होंने भी उन्हें भगवान बनाकर पूज ही दिया। कौन परवाह करता है कि बुद्ध के दिल पर क्या गुजर रही है?

-दीप त्रिवेदी

क्या पुनर्जन्म होता है? अवश्य...। लेकिन प्रकृति के इस सिद्धांत पर कि यदि आप हैं ही नहीं तो ‘पैदा’ नहीं किये जा सकते; और आप हैं तो मिटाये नहीं जा सकते।

-दीप त्रिवेदी

दुनिया के बुद्धिमानों को धर्म में इतनी अरुचि क्यों हो गयी? क्योंकि बुद्ध, जीसस व कृष्ण के नाम पर उनको इन महापुरुषों की बातों के बदले धर्मगुरुओं ने अपने द्वारा रचित बाइबल व वेद वगैरह उन तक पहुंचाए।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।

-दीप त्रिवेदी

क्या कभी आपने शेर को शिकार करते सिखाने की, या बंदरों को उछलना सिखाने की; या फिर गाय को मांसाहार न खाने की सलाह देने वाली Classes देखी है? तो फिर हमें क्या व क्यों सिखाया जा रहा है? कहीं हमारे धर्मगुरु व शास्त्र हमें जानवरों से भी गये-बीते तो नहीं समझ रहे?

-दीप त्रिवेदी

विज्ञान अगले लाख वर्ष कोशिश कर ले तो भी Blood Test की तरह हमारे भीतर छिपे ‘‘भावों के Test’’ हेतु कुछ नहीं खोज सकता। क्योंकि यह सायकोलोजी का विषय है, और पदार्थ विज्ञान की पहुंच सायकोलोजी तक कतई नहीं।

-दीप त्रिवेदी

हम यह सीधा सत्य क्यों नहीं समझते कि हमें अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सिर्फ अपने साथ बिताना होता है। फिर क्यों हम किसी मनुष्य या वस्तु पर निर्भर हो दुःख को आमंत्रित करते हैं? भला अपने आनंद हेतु दूसरों पर निर्भर रहने वाला कभी खुश हो ही कैसे सकता है?

-दीप त्रिवेदी

आपने कुछ किया है या आप कुछ कर सकते हैं, यह गलतफहमी कभी मत पालना। ...यह स्पष्टरूप से समझ लें कि आपसे सबकुछ आपका स्वभाव ही करवा रहा है।

-दीप त्रिवेदी

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